Wednesday, July 19, 2017

सत्य जीवन को सौंदर्य प्रदान करता हैं

हमारी पहली पाठशाला हमारा घर है और पहली शिक्षक हमारी माता है। माता के लाड़-प्यार से सिखाए सबक हम याद रखते है। हमारे परिवार के सदस्यों का आचरण और चरित्र भी हमें जाने अंजाने बहुत से सबक दे जाता है। हमारे कुल और वंश का इसलिए हमारे शास्त्रों में बड़ा महत्व बताया गया है किंतु आज हम  अनुभव कर रहे है कि ये बातें पुरानी हो गई  और अब इनको कोई महत्व नहीं देता। इसका कारण यह है कि सयुक्त परिवार प्रथा अब बहुत ही कम रह गई है। अब तो एकल परिवार है जिनमें माता पिता और बच्चें ही साथ रह रहे है। माता पिता के पास भी समय नहीं है । वे आधुनिकता की चक्की में पीसे जा रहे है। चरित्र और आचरण की शिक्षा बच्चें कैसे पाए। बच्चे अपनी सूक्ष्म दृष्टि से और भोली समझ से बिना कुछ सुने कहे भी बहुत सी बातें सीख लेते है पर वे प्रश्न कहाॅ करें? स्पष्टीकरण किससे प्राप्त करें? किसी के पास तो समय नहीं है।

पहले सयुक्त परिवारों में दादा-दादी परिवार के अभिन्न अंग होते थे। कहते है मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता हेै। दादा-दादी बच्चों के लिए सचमूच प्यार का खजाना लूटाते थे। वे बच्चों के साथ खेलते थे। उन्हे कहानियाॅं सुनाते थे और बच्चों की समस्याऐं हल करते थे। माता पिता इस दिशा में स्वतंत्र रहते थें। उन्हें चिंता नहीं रहती थी। आज दादा-दादी शायद ही कहीं मिले। जहाॅं वे है भी वहाॅ उनका वह महत्वपूर्ण स्थान नही है। वे घर के मुखिया नहीं है। इसलिए उनकी कोई सुनता नहीं है। अब न दादा दादी के पास बालमन को बहलाने के लिए कहानियाॅ है ओैर न  उत्साह। इस स्थिति में भी टी.वी. के अतिरिक्त मोबाइल,कम्प्यूटर भी बच्चों के खेलने के साधन बन गए है। बच्चें ज्यादा समय इन्हीं के साथ खेलते है वे इन्हे देखकर ही नए नए सबक जाने अनजाने सीखते है और सच कहें तो उनका बचपन इनमें खर्च हो जाता है। बच्चें कम्प्युटर, मोबाइल आदि का ज्ञान अपने माता पिता से भी अधिक रखते है।

बच्चों के खेलने के मैदान तो रहे नही। इसलिए भाग दौड़ समाप्त सी हो गई है। अब खुले मैदान न होने से दोस्तों के खाथ खेलना, प्रतियोगिता करना सम्भव ही नही है। परिवार भी इतने छोटे हो गए है कि भाई बहनेां के मध्य भी प्रेम - अपनत्व भाईचारे के पाठ सीखे नहीं जा सकते। एक दूसरे की सहायता, एक दूसरे के लिए त्याग करना अब परिवार की पाठशाला के पाठक्रम का अंग नहीं रह गया है। ऐसे में पुस्तकीय ज्ञान ही एक मात्र सहारा है। पुस्तकीय ज्ञान भी आचरण नहीं सिखाता, वह तो अधिक से अधिक नम्बर परीक्षा में लाने में जोर देता है। शिक्षक भी इसी पर ध्यान देते हैं  चरित्र निर्माण पुस्तको का विषय हो गया है। आज तक उपदेशों से तो कभी चरित्र बना नहीं।

इसलिए हम पाते है कि विद्यार्थीयों में दृढ़ संकल्प कि कमी है। धैर्य वे जानते ही नहीं। थेाड़ी सी असफलता उन्हें निराशा के गर्त में ढकेल देती है। वास्तव में माता पिता के स्वप्न भी ऊॅचे ऊॅचे होते है। वे अपनी महत्वकांक्षा के हण्टर से अपनी ही संतान को इतना घायल किए होते है कि बच्चों केा कुछ समझ में नहीं आता।माता पिता बच्चों की सफलता के लिए सुविधाओं के इतने जाल फैला देते है कि बच्चें उससे बच ही नहीं पातें। लाखों रूपये खर्च करते है कि वे आॅख बंद कर कह रहें है कि चढ़ जा बेटा सूली पर, भगवान भला करेगा। आज तक दुनिया में कोई भी अपनी महत्वकांक्षा किसी पर लाद कर सफल नहीं हुआ है। सफलता मिलती है कठोर परिश्रम से, धैर्य से । उसके लिए व्यक्ति को स्वयं अपने स्वप्न बुनना पड़ते हैं।फिर यह भी निश्चित नहीं है कि सफलता मिलेगी ही। सफलता की यात्रा में सबसे पहले असफलता के स्टेशन आते है। कभी कभी एक दो नही, निरन्तर कई असफलता मिलती ही जाती है तब कहीं सफलता के शिखर पर पहुॅचा जा सकता है।

आज बड़ी विचित्र स्थिति है। हजारों लाखों युवक सफलता के लड्डू को  खाना चाहते है। सब कड़ी मेंहनत करते है। सबके पीछे डण्डा लेकर माता पिता खडे़ है। लपको और खाओं इस सफलता के लड्डू को पर निराश हाथ लगती है। तब मन भटकता है। बेईमानी के रास्तें खोजे जाते है। धन और सत्ता के रास्ते शिखर को छूने का प्रयत्न होता है। यह रास्ता भटकाने वाला है। क्योकि इस पर लोभ लालाच आकर्षक मुख मुद्रा लिए खड़े मिलते है। स्वार्थेा को मकड़ जाल यहां भी बिछा मिलता है। आदमी इसमें उलझता है और सरल व्यक्ति भी झूठ के प्रपंच में अपराध की दुनिया में पहुॅच जाता है। आज चारों और झूठ का बोलबाला इसलिए दिखाई देता हैं। हमने तो सुना है कि इस युग मेें सच्चे का मुॅहकाला है। सच्चाई और ईमानदारी को लोग मुर्खता समझने में लगें हैं, लेकिन क्या यह सच हैं?

हमारा अनुभव तो यह है कि दुनिया में सुख शान्ति का  मार्ग सच्चाई और ईमानदारी का ही है और कोई मार्ग  है ही नहीं। असत्य बेईमानी का मार्ग कितना ही सुगम,आकर्षक लगता हो किंतु ले जाता है वह अशान्ति असफलता अपराध की और ही फिर भी प्रश्न शेष रहता है फिर यह दुनिया चल कैसे रही है?

क्या यह दुनिया आज असत्य और बेईमानी पर चल रही है? आप गम्भीर चिंतन करेंगें तो पाएगें कि नही, यह झूठ है। दुनिया चलती है विश्वास और भरोसे से। विश्वास और भरोसा सत्य के अतिरिक्त कहीं मिल नही सकता । आज झूठ भी सत्य का आवरण ओढ़े हमारे आसपास घुम रहा है। असत्य की यह मजबूरी होती है कि वह अपना असली चेहरा छिपाऐं।  कोई धोख्ेाबाज अपना असली चेहरा दिखाकर आजतक दुनिया में सफल नही हुआ है। इसलिए आज यदि झूठ, फरेब,बेईमानी कहीं सफल होती दिखाई देती है तो यह भ्रम है सदा से झूठ यही करता आया है पर वह लम्बे समय तक चल नहीं पाता। झूठ का गुब्बारा छोटी सी आलपीन से भी फूट जाता है।

वास्तव मे मनुष्य मे स्वभाव से लाभ लालच रहता है यह आदमी को भटकाता है। आदमी की स्वार्थवृति जागजाती है और उसका अहंकार उसे बढ़ावा देता है कि कहाॅ कठिन रास्तों पर चलते हो, शार्टकट मारो और छू लो सफलता। झूठ का बगीचा लोभ लालच की हवा में पनपता है। उसके बीज अहंकार बनकर उछलते है पर यह सब सत्य की भूमि पर पनप नहीं सकते। सच्चाई का मार्ग एक मात्र सुख शान्ति व सफलता का मार्ग है। एकएक क्षण कल्पना कीजिए कि यदि मानव समाज सच्चाई के मार्ग पर चलने की ठान ले तो अदलतो के लाखों करोड़ों मुकदमों का क्या हो। अगर व्यक्ति अदालत में अपने अपराध और गलतियों को ज्यों का त्यों स्वीकार करने लगें  तो क्या हो? हमारी अदालतों, वकील,मुंशी के पास क्या काम रह जाए। हमारे पुलिस स्टेशन और प्रशासकीय अधिकारीयों के पास क्या काम रह जाए। मिलावट खौर, धोखेबाज, रिश्वतखोर, भ्र्रष्टाचारी कहाॅ जाए? इन सबकी नगण्य आवश्यकता भी न रहे। इसका अर्थ हम समझ ले।

यह संसार और इसकी सारी समस्याऐं झुठ पर खड़ी है। हमारी राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र असत्य के पोषण पर जिन्दा है। हमारी बेचैनी, अशान्ति तनाव, बीमारीयाॅ, अपराध ये सब झूठ की पैदाईश है। इस सबका समाधान क्या है ?

विधि नहीं है समाधान :- अब आगे विचार कीजिए। जब हमारी संसार की (केवल भारत की ही नहीं) सब समस्याऐं झूठ पर खड़ी है तो क्या विधि विधान से इस झूठ की समाप्ति हो सकती है। विधि विधान से आज तक एक भी अपराध दण्ड के भय से समाप्त नहीं हुआ है। हम दण्ड को कठोर करते है, अपराध बढ़ जाते है। हमारे ही देश में बलात्कार, यौन शोषण जैसे अपराधों के लिए आजीवन कारावास और मृत्युदण्ड जैसे दण्डों का प्रावधान दिल्ली के निर्भयाकाण्ड के बाद किया गया। ये अपराध घटे नहीं बढ़ गए। अपराधों को रोकने की ताकत दण्ड में नहीं होती। अपराधों को रोकना पड़ता है तो मनुष्य में आन्तरिक रूप से मानसिक परिवर्तन करना ही पड़ेगा। उसमें मानवता की संवेदना जगाना पड़ेगी। उसे जागृत करना पड़ेगा। यह प्रेम और सहानुभूति से ही सम्भव है। इस कार्य को कर सकती है हमारी माताए। माता हमारे जीवन की प्रथम गुरू है। वह अपनी गोद में हमें संस्कारों का पाठ पढ़ाती है। इसके साथ आते है हमारे परिवार जहाॅ हम अनुशासन के साथ मर्यादा, अपनत्व, त्याग, सेवाभाव और संस्कारेा को मजबूत करते है।ये सारे जीवन हमारे लिए मार्गदर्शक होते है।

हमारा सामाजिक वातावरण और संगी साथी भी हम पर प्रभाव डालते है। वे हमें अनेक आकर्षण दिखाकर भटका सकते है। सामाजिक वातावरण का भी आत्याधिक प्रभाव रहता है। आज दूरदर्शन कम्प्यूटर नेट, सिनेमा और विज्ञापन भी हमें अनेक लुभावने स्वप्न दिखाते हैं। इनसे कैसे बचे?

उपरोक्त सबसे हमारे विचार, संस्कार और  चरित्र बनते है। सामाजिक वातावरण और संगी साथियों के प्रभाव से सुरक्षित रहने के लिए हमारे धर्मग्रंथो ने व्रतो का आविष्कार किया। व्रत धारण करने का अर्थ है कि कुछ कार्य करने के लिए हम दृढ़ संकल्पित है। कुछ भी हो पर हम व्रतों के पालन में कठोर रहेंगे चाहे फिर भले ही भौतिक हानि उठानी पड़े या शारीरिक कष्ठ भोगना पड़े। देखिए ऋग्वेद में कहा गया है-व्रत बंधन नहीं बल्कि स्वतंत्रता का द्वार है। साहित्यकार व विचारक वासुदेव शरण अग्रवाल कहते है-‘‘व्रत से रहित जीवन उस जहाज की तरह है जिसके नायक ने अपने गतव्य स्थान का निश्चय न किया हो‘‘ मज्झिम निकाय में कहा जाता है-शुद्ध और पवित्रकर्मी के व्रत स्वतः ही पूर्ण होते रहते है।‘‘

व्रत हमें संसार के परिवर्तनशील उबड़  खाबड़ रास्ते में दिशा दर्शन कराते है। महाभारत के अनुशासन पर्व में वेदव्यास जी कहते है-मनुष्य के लिए तीन बातों का ही उत्तम व्रत बताया गया है।-किसी से द्रोह न करें, दान दे तथा दूसरेां से सत्य बोले।‘‘

सत्य वचन और सत्य आचरण हर मर्ज की दवा है। इसके पालन करने से जीवन में सुख-शान्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। व्यक्ति निर्भय हो जाता है। वह विश्वसनीय बन जाता है। और फिर सफलता मुस्कराते हुए उसकेा इन्तजार करते मिलती है। झूठ को इसलिए किसी भी धर्मशास्त्र में स्थान नहीं मिला है। शतपथ ब्राम्हण्पा में कहा गया है- वह पुरूष अपवित्र है जो झूठ बोलता है। वेद व्यास जी महाभारत के वनपर्व में लिखते है-मैं मृत्यु से उतना नहीं डरता जितना झूठ से डरता हूॅ। झूठ  के प्रति इतना स्पष्ट मत  होने के बाद भी हमारे दण्डशास्त्र में इसे अपराध नहीं माना है। यह मन का विषय हैं। समाजशास्त्र का विषय है और इससे निपटने के लिए सत्यव्रत को धारण करने के लिए निर्दशित किया गया है। इसलिए हमारे शास्त्रो ने सत्यव्रत धारण कर जीवन सफल बनाने का उपदेश दियज्ञं

धर्म का विषय नहीं है सत्य :- सत्य किसी धर्म विशेष का विषय नहीं हैं दुनिया का हर धर्म सत्य के पक्ष में खड़ा है। सत्य वास्तव में धारण करने का विषय है। जीवन को आनंदमय बनाने की रामबाण औषधी है सत्य। सत्य के आचरण से कोई करोड़पति, अरबपति बन जाएगा-ऐसी घोषणा कोई नहीं करता पर शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत होने के कई उदाहरण हमारे सामने है। जितने भी महापुरूष हुए है उन्होने सत्य का आचरण किया है और इस संबंध में प्रेरणा दी है किंतु महात्मा गाॅधी ने तो जीवन की प्रयोगशाला में सत्य पर प्रयोग ही कर डाले। उनकी जीवनी की पुस्तक का शिर्षक ही है - सत्य के प्रयोग। उन्होने सत्य को ईश्वर माना और सत्य के प्रति इस निष्ठा की पूजा की। वास्तव में सत्य ही ईश्वर है। उसका एक मात्र सहोदर प्रेम है। गांधीजी कहते है-सत्य अहिंसा और प्रेम एक ही चीज है।

सत्यनारायण की व्रत कथा :- भारत के विभिन्न प्रदेशों में सत्यनारायण की व्रत कथा कहने का एक रिवाज है। ब्राम्हण या पूजारी इस कथा को कहता है और सत्यनारायण व्रत करने से लकड़हारे, बुढ़े ब्राम्हण सेठ और राजा को क्या प्राप्त हुआ इसका वर्णन करता है। इस कथा का उद्देश्य हीे यह है कि बार बार लोग इसे सुने और सत्य आचरण का व्रत धारण करें पर न तो ब्राम्हण पूजारी इस कथा को गम्भीरता से ग्रहण करते है और न सत्य का व्रत धारण करते है अतः इस कथा और व्रत के धारण करने का कोई अर्थ नहंीं रह जाता।

मेरे जीवन में सत्यनारायण :- मैं जिस परिवार में जन्म लिया वहाॅ सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन परम्परा से होता आया था। मैं ऐसा अनुभव भी करता हूॅ कि मेरे माता पिता सत्यव्रती थे अैार झूठ के प्रति घर में तिरस्कार का भाव था। छह भाईयों और एक बहन के परिवार में सत्यवचन और सत्य आचरण के संस्कार बिना किसी उपदेश के प्रभावशील थे। सादाजीवन, उच्च विचार का जीवन था। कोई दिखावटीपन का भ्रम जाल था ही नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो परिवार में आपसी पे्रम, सहयोग और विश्वास का वातावरण था। पिता-माता के प्रति सम्मान भाव, अपनों से बड़ेंा के प्रति आदर और मर्यादा का पालन होता ही था। मुझे कहना चाहिए कि कड़ा अनुशासन था।

मैं धन्य हूॅ कि ऐसे परिवार में मेरा जन्म हुआ। मेरी माता जी ने बताया कि मेरा जन्म पौष की पूर्णिमा के पुण्य नक्षत्र में हुआ था उस दिन हमारें घर सत्यनारायण व्रत कथा चल रही थी। तब मैं जन्मा मेरी दादी माॅ ने घर के बाहर आंगन में जहाॅ कथा चल रही थी आकर कहा- यहाॅ सत्यनारायण की कथा चल रही है। और  अंदर सत्यनारायण पधार गये है। वास्तव में मेरा जन्म कर्क राशि में हुआ और जन्मपत्री का नाम हेमचंद्र निकला पर यह नाम कभी प्रयोग में नहीं आया । सत्यनारायण ही पुकारा गया। यहाॅ तक की मुझसे बड़ेां के द्वारा प्रेमवश कहें सत्तू भी हो गया पर हेमचन्द्र तो कभी न हुआ।

वह समय ही ऐसा था जब भगवान के पवित्र नामों का चलन था। हमारें परिवार में केवल मैं ही भगवान के इस पवित्र नाम से पुकारा गया। इस नाम का प्रभाव बचपन और भरी जवानी में कितना रहा मैं याद करकर भी कह नही सकता। झूठ तो मैं कई बार बोला होऊॅगा। दावें से कुछ नहीं कहा जा सकता पर जब कुछ विचारशील हुआ तब नाम पर चिंतन किया, मुझे लगा-‘‘मैं तो सत्यनारायण हूॅ। मेरी दादी ने यह नाम दिया है। इस पवित्र नाम की पवित्रता की मुझे रक्षा करना चाहिए और मैं सावधान हो गया। जाग गया और जब जब असत्य भाषण के अवसर आए मेरे मन में खूद के प्रति धिक्कार भाव जागने लगा। आज में शपथपूर्वक कह सकता हॅू कि झूठ बोलने और असत्य दिखावटी आचरण पर इस नाम ने बड़ी कठोरता से लगाम कसी है।

सत्य बोलने और सत्यव्रती होने से इस जगत में भी लाभ ही लाभ है। हमारी छवि यदि ऐसी बन गई तो हम विश्वसनीय बनजाते है। सत्यकथन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि डर का भूत हमसे कोसो दूर भाग जाता है। प्रेम का साम्राज्य हमारे आसपास खड़ा हो जाता है और झूठे, मक्कार, धेाखेबाज अपराधी प्रवृति के व्यक्ति अपने आप आपसे दूर भागने लगते हैं। मेरा तो एक विचित्र अनुभव भी रहा कि रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी, षड़यंत्र बाज अधिकारी जो हमारे बाॅस रहे है, वे भी मुझसे दूरी बनाए रखे। डर कर रहे और कभी भी मेरे विरूद्ध सामने नही आए। हाॅ यह जरूर हुआ कि मेरे अन्य साथियों ने शासकीय सेवा में मलाईदार पोस्टींग प्राप्त कर अनुचित लाभ उढ़ाए उसकी गंध भी मुझे नहीं लगी।

इस सत्यव्रती होने का विशेष लाभ यह रहा कि लम्बी सेवा अवधी में विभागीय जाॅच, निलम्बन जैसी कार्यवाही कभी नहीं हुई। मेरी साथी मजाक करते रहे-धिक्कार है आपको जो आपने राजस्व विभाग में ऐसे समय गवांया।

सत्य के प्रयोग :- पूज्य महात्मा गाॅधी ने अपने जीवन में सत्य के प्रयोग किए और उसके परिणाम हमारे सामने अपनी आत्मकथा के रूप में रखे। उन्होने यह प्रेरणा दी कि हम सब भी सत्यमय जीवन व्यतीत कर सत्य के प्रयोग जीवन में करे। बिना प्रयोग किए सत्य का स्वाद और आनंद मिलने से रहा। मैंने सत्य के प्रयोग को सामान्य रूप से अपनाया। सत्य को जीवन में उतारना सबसे सरल है। आपको कुछ भी करना नहीं पड़ता। जो है जैसा है उसे स्वीकार करना पड़ता है  पर इसमें कठिनाई यह है कि लोभ लालच और स्वार्थ से भरे संसार में सत्य को स्वीकारना बड़ा अटपटा और झमेले वाला लग सकता है। झूठ बोलकर जो कुछ पाया जा सकता है, वह संसारिक लाभ से हम वंचित रहते है। और कभी कभी इस कारण खतरे भी उठाने पड़ते है पर अंत में हम पाते है असीम संतोष, शान्ति और आनंद। सच को स्वीकार करने का आनंद जब भी है  जब हम अपरिमित हानि यहाॅ तक की जीवन को भी दांव पर लगाने की स्थिति में पहुॅच जाए तब भी नहीं डिगें तो फिर जीवन का अमरत्व हमें प्राप्त होता है।

मैनें तों एक साधारण जीवन पाया, नायब तहसीलदार था तब किसी प्रकरण में कुछ गलती हो गई होगी, मुझे अधिकारी ने बुलाया और पूछताछ की, मैंने जो स्थिति थी उसकी जानकारी दी। अधिकारी मुझसे प्रसन्न थे। बोले-मैं स्पष्टीकरण माॅगूगा। आप लिख दीजिए कि पटवारी द्वारा गलत जानकारी देने के कारण यह भूल हो गई। मैंने कहा-नहीं सर, यह गलती तो मुझसे हुई है। मैं ऐसा कैसे लिख दूॅ। वे नाराज हुए। बोले-फिर भुगतो दण्ड।

मैं  चला आया। आपको आश्चर्य होगा मेरे विरूद्ध कुछ नहीं हुआ। मैं  सच बोल कर भी बचा रहा।

एक बार एक न्यायाधीश प्रकरण में मेरा बयान था। मैंने जो हुआ और किया था उसका सच सच वर्णन किया। मेरे बयान से अपराधी को लाभ मिल रहा था। न्यायाधीश भी नाराज दिखे। उन्होंने भी कुछ प्रश्न किए पर मैं टस से मस नहीं हुआ। उस बयान पर आम धारणा बनी कि न्याययधीश मेरे विरूद्ध विभाग को कार्यवाही के लिए लिखेगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बाद में उक्त न्यायधीश से मेरी चर्चा हुई। बोले- हाँ,उसे दिन यही विचार आया था पर निर्णय लिखने तक मैं इस निश्चय पर पहुॅचा कि आप अपने भोलेपन व अनुभवहीनता के शिकार है और मन बदल गया।

मैं रीवा में डिप्टी कलेक्टर था। कलेक्टर एक मामले में रूचि ले रहे थे। उन्होंने कुछ पुछताछ की। मैं डटा रहा और अंत में मैंने कहा-सर, मेरा नाम सत्यनारायण है और में झूठ नहीं बोलता। जो वस्तु स्थिति है वह यही है।

इस प्रकरण में एक विधायक महोदय की भी रूचि थी। एक बैठक में उन्होंने कलेक्टर से कहा-आपके एस. डी. ओ. का प्रतिवेदन भ्रामक है। फिर से जाॅच कराइए।

कलेक्टर ने सुना और फिर पूर्ण विश्वास से बोले- यह एस. डी. ओ. सच बोलता है। इसकी रिपोर्ट झूठी हो ही नहीं सकती।

सत्य आपको विश्वसनीय बना देता है। मुझे दादी माॅ की याद आई जिन्होने मुझे यह पवित्र नाम दिया।

सम्मान दिलाता है सत्य : सत्य वचन और सत्य आचरण आपको प्रतिष्ठा और सम्मान दिलाता है। इससे निस्वार्थ प्रेम की खेती होती है। शासकीय सेवा में मुझे जो भी प्रतिष्ठा और सम्मान मिला उसका कारण मैं सत्यव्रत मानता हूॅ। मुझे अपने स्वाभीमान पूर्वक जीवन यापन में यहीं एक सहारा रहा।

शासकीय कार्यालय के कर्मचारी ही नहीं जनता में भी सत्यव्रत आपकी छवि उज्जवल बनाता है। आपके प्रति विश्वास और प्रेम जगाता है।

एक बात और-सत्य का कभी विज्ञापन नहीं करना पड़ता। यह घोषणा नहीं करना पड़ती कि आप सत्यवादी है। जंगल की आग की तरह यह खबर चुपचाप फैल जाती है। आपको मानवीय प्रतिष्ठा  मिलती है इससे। हाॅ भ्रष्ट, मक्कार, झूठे आपके प्रति अच्छे भाव नहीं रखते। वे आपको मुर्ख समझते है। कहते है-आप समय के साथ नहीं चल रहें। पद पर रहते पद का फायदा नहीं उठा रहें। बुढ़ापे में पछताऐंगें। आपके बच्चे ही आपसे नफरत करेगे। कहेगे- आपने हमारे लिए कुछ नहीं किया। लेकिन यह कोरी कल्पना है। ईश्वर सबका रखवाला है। वह आपको आपके भाग्य का सब कुछ देता है। मेरा अनुभव तो बहुत अच्छा है। मैं अस्सी वर्ष की उम्र पार कर रहा हूॅ।

Tuesday, November 3, 2009

वेद की ऋचाओं में सूर्य देव

यजुर्वेद में परमात्मदेवसविता [सूर्य] से प्रार्थना की गई है, हमारी बुराइयां दूर हों और मन के विकार समाप्त हों और इसके स्थान पर हमें अच्छाइयों से भर दीजिए। मंत्र इस प्रकार वर्णित है- ॐविश्वानिदेव सवितर्दुरितानिपरासुव यदभद्रंतन्नआसुव। वेदों में सूर्योपासना के विविध मन्त्र हैं। वेदों में सूर्य [सविता या अग्नि तत्व] के विषय में जहां ज्योति, प्रकाश और अंधकार रिपु के रूप में उल्लेख आया है, वहीं पुराणों में उत्पत्ति, कार्य तथा शक्ति के विषय में प्रेरक कथाएं भी हैं।

यजुर्वेद में जहां अग्नि चयन का चित्रण है, वहीं प्राणाग्निके स्पन्दन का स्त्रोत, कारण सूर्य कहा गया है। वेदों में सविता की संज्ञा मन है। जैसे सूर्योदय से धरती का अंधकार समाप्त हो जाता है,  उसी प्रकार मन में परमात्मा का प्रकाश व्याप्त होने पर अंतहृदयका अंधकार शून्य हो जाता है। अध्यात्म के योद्धा इसे परमात्मा का तेज मानकर इसकी प्रार्थना स्तुति और उपासना करते हैं। वेद में वर्णित है- सविता वैदेवनांप्रसविता:  अर्थात् सविता देव सूर्य प्रत्येक प्राण केंद्र में उदबुद्ध होकर अन्य सभी देवों को आकृष्ट कर लेता है।

वेद में सविता को देवों का योक्ता कहा गया है। यही सबके कर्मो का विधान करने वाला है- महीदेवस्य सवितु:परिष्टुति:। सविता देव की ही प्रशंसा हमारे लिए उपादेय है, क्योंकि यही जगत के संचालक हैं। विराट विश्वात्मकसविता देव से प्राप्त सावित्री धारा तन से प्रतिफलित होने पर गायत्री अभिधान मिलता है। द्युलोकसावित्री और पृथ्वी गायत्री है। मूलभूत शक्ति के ये दो रूप हैं।

सूर्य देव की उपासना सावित्री और गायत्री दोनों की उपासना होती है। ऋग्वेद में परम ज्योति [अग्नि स्वरूप] को कई रूपों में उपास्य माना गया है। श्रेष्ठ ज्योति सविता देवको वेदों में अमृत वर्णित किया गया है। मत्यभूतोंमें समाहित अमृतदेवअग्नि ही है।  इदं ज्योतिरमृतंमत्र्येषु।[ऋग्वेद 6।9।4] आयुर्बलसे युक्त अग्नि म‌र्त्य भूर्तोमें रहने वाला अमृत अतिथि है। [ऋग्वेद 6/4/2] मत्र्येषुअग्निमृतोनिधायि [ऋग्वेद 7/4/4] यह अमृत ही निधि स्वरूप है। सविता देव ब्रह्मरूप में जीवन-मरण के साक्षी और कारण हैं।

यजुर्वेद में तीन तरह की अग्नि का उल्लेख है। विभा तेअग्नेत्रेधात्रयाणि [यजुर्वेद 12/19]अर्थात् मन, प्राण और वाक् ये तीन अग्नियां हैं। वैदिक ऋषि तीन नामों से उपासना करते हैं। ऋग्वेद [1/16/4/1] में तीन अग्नियोंको तीन भ्राता कहा गया है। सूर्य अग्नि का चित्रण वेद में विस्तृत ढंग से है।


वैदिक ऋषियों ने सूर्य उपासना को महत्व इसलिए दिया है क्योंकि यह भौतिक, शारीरिक सामाजिक आर्थिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है। ऋक संहिता के [1/191] सूक्त में सूर्य देवता को गरल को दूर करने वाला कहा गया है।

अथर्ववेद[1/22/1] में आया है कि शारीरिक और हृदयगत रोगों का अपहरण करने में सूर्य के साम‌र्थ्य का उल्लेख कई ऋचाओंमें है। महर्षि याज्ञवल्क्यने सूर्य की उपासना कर सम्पूर्ण यजुर्वेद प्राप्त कर लिया था। सूर्य का सम्बन्ध सभी वेदों से है। पृथ्वी के कण-कण में सूर्य से ही जीवन को गति मिलती है।

Friday, October 30, 2009

जीत आपकी ही है



हमारा जीवन क्या है? इसकी अलग-अलग विद्वानों ने अपने ढंग से व्याख्या की है। कुछ कहते है यह एक कभी न खत्म होने वाली यात्रा है और दूसरे इसे बाजार बताते है जहाँ हमारे गुण अवगुणों का मूल्यांकन होता है। ऐसे भी विद्वान है जो जीवन को नाटक कहते है। उनका मत है कि हम सब संसार में एक विशेष प्रकार का अभिनय करने आते है जो अपने कार्यो से सर्वश्रेष्ठ अभिनय करता है, उसे याद किया जाता है। लेकिन इन सबसे अलग हट कर ऐसे भी विद्वान है जो इसे एक युद्ध कहते है। उनका मत है कि जीवन रूपी युद्ध में हम सब अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर विजेता बन सकते है। जीवन एक अवसर है जिसमें हम सफलता पाते है।

क्या जीवन एक युद्ध है - सच पूछो तो सफल जीवन एक युद्ध है। इसमें जीवन मरण दोनो है। शुभ है तो अशुभ भी है। यहाँ कर्म ही कर्म है। जीवन में सब गुण अवगुण समाहित हो जाते है। एक सैनिक की तरह जो जिया, उसका जीवन एक सफल जीवन माना जा सकता है। इसलिए साहित्यकार जयशंकर प्रसाद कहते है ’ जागरण का अर्थ है कर्म क्षेत्र में अवतीर्ण होना और कर्मक्षेत्र क्या है जीवन संग्राम ।’ साहित्यकार जैनेन्द्र का मत है ’जीवन कुरूक्षेत्र है। वह इसलिए युद्ध क्षेत्र है भी है। यह जीवन की विचित्रता और जटिलता है कि युद्ध को और धर्म को उसमें साथ साथ साधना पड़ता है। इस साधना में जीवन का रूप आप ही आप धर्म युद्ध हो जाता है।

क्यों है संग्राम - वास्तव में हमारा जीवन एक संग्राम है। इस संग्राम को धर्मयुद्ध बनाना ही एक कला है। भारतीय शास्त्रों में इसलिए इस संग्राम का गौरवगान मुक्त कण्ठ से किया गया है। इसलिए कहा जाता है कि संग्राम में मारे जाने पर स्वर्ग प्राप्त होता है और जीतने पर यश मिलता हैं । लोक में दोनो ही सम्मानीय है। इसलिए युद्ध सार्थक होते है। भगवत् गीता जैसा दार्शनिक ग्रन्थ यही कहता है । गीता का गान युद्ध क्षेत्र में ही हुआ और इसी में भगवान कृष्ण ने जीवन जीने की कला का ज्ञान कराया है। महात्मा गाँधी तो कहते है कि गीता माता है और जब भी कोई समस्या आती है वे इस माता के चरणों में अपना सर रख कर समाधान पूछते है। युद्ध के समय गाए गए गीत का यह अद्भूत महत्व है। पृथ्वीराज रासों में कवि चन्द बरदाई कहते है, ’ सभी सामन्त युद्ध में रस में लीन होने के कारण ब्रम्ह ज्ञानी से प्रतीत होते थे क्योकि उनके पास सुख दुःख की लौकिक भावना नहीं दिखाई पड़ती थी ।

गीता हमें जीवन में निष्काम कर्म करने का सन्देश देती है। संसार की आसक्ति ही हमारे दुःख और कष्ट का कारण है लेकिन क्या निष्काम कर्म योग संसार में व्यवहारिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है जहाॅ हम राग, द्वेष, घृणा लालच में दिन रात पड़े हुए है। इसलिए दार्शनिक सिद्धांत तक तो यह ठीक लगता है लेकिन जीवन संग्राम के व्यहारिक क्षेत्र में हम उसका कैसे प्रयोग करें? यह समझ में नहीं आता। यदि युद्ध क्षेत्र का सैनिक ब्रम्हज्ञानी है तो कैसे? यह समझ नहीं आता तो इसके लिए हम पुनः महात्मा गाँधी की वाणी सुनते है वे अहिंसा के प्रबल पक्षधर है। वे कहते है,   ’’एक सैनिक यह चिन्ता कब करता है कि उसके बाद उसके काम का क्या होगा? वह तो अपने वर्तमान कर्तव्य की ही चिन्ता करता है।’’ अतः यह स्पष्ट है कि एक सैनिक की तरह यदि हम अपने वर्तमान कर्तव्य कर्म को ही चिन्ता रहित होकर करते रहे तो हमारा कृत्य निष्काम कर्म होगा। होता यह है कि हम कर्म की प्रेरणा स्पष्ट रूप से अपने स्वार्थ, प्रलोभन और अहंकार के वश करते है। कर्म करते हुए हमारे मन में राग, द्वेष , घृणा, शत्रुता, लोभ, लालच के भाव हमें प्रेरित करते रहते है। मृत्यु की तो हम सोच ही नहीं सकते। यदि मृत्यु की आशंका मात्र हो तो हम भाग खड़े हो जब कि एक सैनिक जो युद्ध क्षेत्र में खड़ा है वह पहली शर्त के रूप में मृत्यु को स्वीकार करता है। मृत्यु से मित्रता के बिना तो कोई सैनिक हो ही नहीं सकता। हर सैनिक युद्ध शान्ति के लिए लड़ता है और अन्य कोई उसका उद्देश्य नहीं होता ।

जीवन का संग्राम युद्ध की तरह हमारे अन्तरतम की गहराई में सुलगता रहता है। जीवन की कला इसमें में है कि इस युद्ध को हम धर्म युद्ध की तरह लड़े।

युद्ध में कोई द्वितीय पुरूस्कार नहीं होता - हमारा जीवन एक युद्ध है। यहाँ हर व्यक्ति एक दूसरे से प्रतियोगिता करता है। अपने आपको सर्वश्रेष्ठ घोषित करता है। सबमें अपने अपने गुण है। यह जीवन संग्राम युद्ध की तरह ही है। लेकिन युद्ध में सैनिकों की एक संस्कृति होती है। नियम होते है कानून होता है उनका अनुशासन होता है। इस संस्कृति में, नियम एवं विधि का पालन करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य होता है। यदि इनका पालन न हो तो दण्ड दिया जाता है।

क्या है युद्ध की संस्कृति ? सेना में जो भी सैनिक युद्धरत होते है, उनका अपना कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता। वे देश के लिए लड़ते है। सबसे पहले देश सेवा उनका मतव्य होता है। उसके लिए प्राणों की बाजी वे लगा देते है। वे जानते युद्ध में हार जीत कुछ भी हो सकती है। वे मृत्यु के लिए तैयार होकर देश के लिए लड़ते है। अपन सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते है। इस युद्ध में या तो आप जितेंगे या आप खत्म हो जाएंगे। यहाँ द्वितीय पुरूस्कार नहीं होता।

ऐसे ही यदि जीवन संग्राम में हम अपने स्वार्थ को अलग रख कर सेवा भावना से सर्वश्रेष्ठ कार्य कर देश समाज के लिए अपने प्राणों की आहूति देने को तत्पर हो तो कहा जाएगा कि हम निष्काम कर्म योग को धारण कर लिए है। फल तो हमें जो मिलना होगा मिलेगा। सैनिक उसकी चिन्ता कहाँ करता है। आज हम स्वतंत्रता संग्राम के सैनिको की इसलिए चर्चा करते है, क्यो करते है उन्हे याद । इसलिए ना कि उन्होने अपने लिए कुछ न चाहा , देश की स्वतंत्रता के लिए वे प्राणों को त्यागने के लिए तत्पर हो गए। निस्वार्थ कर्म ही जीवन के संग्राम में सफलता की पहली और अन्तिम शर्त है।

विकल्प का सवाल ही नहीं - युद्ध में आपको अपना सर्वश्रेष्ठ कार्य प्रदर्शित करना है। जीतों या मरों । स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनोबा भावे ने इसलिए स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने के पूर्व अपनी समस्त उपाधियों को जला दिया ताकि संग्राम के बीच में उन्हे कभी कोई स्वार्थ प्रलोभित न कर सके। जीवन संग्राम में सफलता की वही शर्त है जो युद्ध में सफलता की है। स्वतंत्रता संग्राम भी एक जीवन संग्राम था।

महात्मा सुकरात ऐन्थेस नगर राज्य में विष का प्याला पी गए किन्तु सत्य की उद्घोषणा पर डटे रहे। वे चाहते तो समझौता कर सकते थे पर संग्राम में समझौते कहाँ होते है। फिर सत्य का संग्राम तो अनूठा होता है। महात्मा सुकरात इसलिए सत्य के संग्राम में विजय हो सके क्योकि उन्होने अपने जीवन में स्पाटी राज्य से हुए तीन युद्धों में सक्रिय भाग लिया था और वे महात्मा के साथ शूरवीर भी थे ।

जीवन संग्राम का अर्थ - जीवन संग्राम में हर व्यक्ति का एक लक्ष्य होता है। बिना लक्ष्य का भी कोई जीवन है। फ्रान्स की अध्यात्मिक सन्त श्री माॅ कहते है, जैसा तुम्हारा लक्ष्य होगा, वैसा तुम्हारा जीवन होगा। ’ इसलिए हमारा जो भी लक्ष्य हो, उसके लिए निरन्तर सर्वश्रेष्ठ कार्य करना और ’ करो या मरों ’ के भाव से लगे रहना जीवन के संग्राम में सफलता का सूत्र है। संग्राम में सर्वश्रेष्ठ वीरता भी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं होती । सामुहिक हित ही हमारा हित होता है। इसलिए इस भावना से जो कार्य किया जाएगा वह हर हालत में निष्काम होगा। फिर उसमें हार भी जीत है। जीत तो जीत है ही। हताश और कर्महीन अर्जुन को यही तो गीत सुनाया है भगवान कृष्ण ने।

अतः जीवन को संग्राम माने या नाटक सर्वश्रेष्ठ वीरता दिखाए या अभिनय भाव एक ही है, इसलिए जीवन का कोई लक्ष्य बनाइए । उँचा लक्ष्य चुनिए और संग्राम में करो या मरो के भाव से सम्मिलित हो जाइए जीत आपकी ही है।

Tuesday, October 27, 2009

व्यर्थ की दौड़ से बचिए, आराम से चलिए


जीवन में कर्म का बहुत महत्व है। हम एक क्षण भी बिना कर्म किए रह ही नहीं सकते। बिना कर्म किए रहना ही एक सजा है। कर्म जीवन का यज्ञ है। कर्म के बिना हम जीवन यापन नहीं कर सकते। इसलिए गीता में कर्म योग को प्रमुख स्थान दिया गया है। कर्म का सिद्धांत बड़ा गहन है। हम सब कर्म के अधीन है। हमारे सारे पाप पुण्य कर्म से तय किए जाते है। कर्म जिस भाव से किए जाते है। उसका अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। कर्म हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते है। हमारी आयु सौ वर्ष हो। हम सक्रिय रूप से जीवन व्यतीत करें। यह हमारी कामना होती है।

क्या हमारा जीवन सतत् कर्मो पर निर्भर करता है। क्या हम कर्मो के अधीन स्वास्थ और आयु पाते है ? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर विचार की आवश्यकता है। कर्म के साथ विश्राम का भी अपना महत्व है। हमारा जीवन केवल कर्म करने पर प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह नहीं हो सकता। विश्राम भी आवश्यक है। दौड़ जरूरी है किन्तु हम कहाँ जाना चाहते है? दौड़ का परिणाम क्या होगा, यह भी विचार जरूरी है अतः कर्म के साथ विचार भी आवश्यक है। विश्राम कितना आवश्यक है, यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। आइए देखे, पढे़ इस समाचार को।

आराम करें उम्र बढ़ाए - फुन्दा(जर्मनी) क्या आप शतायु होना चाहते है? अगर हाँ तो काम करना छोडिये और आराम कीजिए। जर्मनी के एक वैज्ञानिक पीटर एकस्ट का कहना है कि लम्बी दूरी तक दौड़ने की बजाय घर में बैठकर आराम करने वाले या स्कवैश खेलने के बजाय दोपहर की नींद लेने वाले व्यक्तियों के अधिक समय तक जीवित रहने की संभावना रहती है। उनका कहना है कि खाली समय में धीरे-धीरे घुमना, भूख से ज्यादा न खाना ही अच्छे स्वास्थ की निशानी है। लेकिन बहुत जल्दी-जल्दी चलना स्वास्थ खराब करता है। प्रो. एक्सट का कहना है कि पचास वर्ष की उम्र पार कर चुके व्यक्ति अन्य कार्यो के लिए आरक्षित उर्जा का उपयोग करके लम्बी दूरी तक दौड़ते है और इस कारण उनकी यादाश्त कमजोर हो जाती है और वे समय के पहले सठिया जाते है। उन्होने सुबह जल्दी जागने को दिनभर की सुस्ती का कारण बताते हुए सूर्योदय के बाद तक सोने की सलाह दी।

आराम हराम है - यह समाचार हमारी धारणाओं को उलटता है। हम समझते है आराम हराम है। इस व्यस्त दुनिया में आराम के लिए समय कहाँ? दिन के चैबिस घंटे आज कम पड़ रहे है। सफलता पाने के लिए शिखर पर पहुँचने के लिए एक अंधी दौड़ चल रही है, उसमें भला विश्राम के लिए कैसे सोचा जा सकता है। खरगोश विश्राम करने ठहर गया तो कुछए से हार गया। भला इस प्रतियोगिता के युग में आराम कैसा?

इस बिन्दु पर विचार आवश्यक है। आराम उम्र बढ़ाने के लिए सचमुच आवश्यक है। हम सफलता की अंधी दौड़ में भौतिक सफलता तो पा सकते है पर स्वास्थ नहीं। इस दौड़ में आराम हराम घोषित कर हम बीमारियां बुला सकते है। स्वास्थ बिगाड़ सकते है और हमारी प्राप्त की गई भौतिक सफलता, समृद्धि पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर सकते है। लम्बी उम्र पाने के लिए आराम उतना ही आवश्यक है जितना कार्य करना, सक्रिय रहना। आज तक जो शिखर पर पहुँचे है उन्होने विश्राम के इस तत्व को याद रखा है।

लम्बी उम्र का रहस्य - लम्बी उम्र का भौतिक सफलताओं से कोई संबंध नहीं रहा है। ऐसे बहुत से कारक है जो लम्बी उम्र और स्वास्थ के कारक है जिन पर हम ध्यान ही नहीं देते। यदि हम उन पर ध्यान दें तो अंधी दौड़ पर अपने आप नियंत्रण लग जाएगा।

ईर्ष्या और क्रोध - ईर्ष्या और  क्रोध लम्बी आयु के दुश्मन नम्बर एक है। इन्हे भगवद् गीता में नरक का द्वार कहा गया है। आज की प्रतियोगिता की अंधी गलाकाट जीवन पद्धति में ईर्ष्या एक आवश्यक प्रेरक तत्व है। ईर्ष्या के बिना प्रतियोगिता का विचार ही हम नहीं कर सकते। एपो‌ॠफा धर्मग्रन्थ में कहा गया है, ईर्ष्या और क्रोध जीवन को छोटा कर देते है ’ इसलिए जरूरी है कि हम लम्बी दौड़ के इस जीवन में ठहर कर विचार करें।

सदाचार - लम्बी उम्र और अच्छे जीवन के लिए सदाचार का होना आवश्यक है। यदि हम दैविय गुणों से पूर्ण होंगे तभी हमारे जीवन में उदारता, त्याग, प्रेम, सहयोग ,क्षमा जैसे गुण होगे। हम ईर्ष्या, द्वेष से अलग रहेंगे। लम्बी और आनन्दपूर्ण जीवन के लिए सदाचारी जीवन आवश्यक है। मनुस्मृति में कहा गया है, ’सदाचारी, श्रद्धावान और ईर्ष्या रहित मनुष्य सौ वर्ष जीवित रहता है। यदि अन्य गुण कम हो या न भी हो यदि सदाचार के गुण व्यक्ति में है तो वह प्रतियोगिता से बाहर रहेगा, तनाव रहित रहेगा और लम्बी आयु पावेगा। ’

द्रव्य शुद्धि कर्मो की शुद्धि - लम्बी आयु के लिए द्रव्यशुद्धि और कर्मो की शुद्धि भी आवश्यक है। यदि हम समाज द्रोही गतिविधियों में संलग्न रह कर अधिकतम् धन अर्जन की प्रतियोगिता में सलंग्न होगे तो भले ही भौतिक समृद्धि हम पा ले किन्तु लम्बी आयु नहीं पा सकते। भारतीय ग्रन्थ योग वशिष्ट में कहा गया है , ’मनुष्यों की आयु कम व अधिक होने में देशकाल, क्रिया, द्रव्यशुद्धि अशुद्धि और स्वकर्मो की शुद्धि -अशुद्धि कारण होते है ’ लम्बी आयु के लिए इन गुणों को सदाचार के अन्तर्गत ही मानना चाहिए।

भोजन - भोजन का स्वास्थपद व स्वच्छ मिलना भी आयु के लम्बे व छोटे होने से सम्बन्ध रखता है। हिन्दी में एक कहावत है ’ कासाभर खाना आसा भर सोना ’ लम्बी आयु का कारक है । उपरोक्त सभी तत्वों में व्यायाम का कहीं उल्लेख नहीं है। यदि हम खूब क्रियाशील हो और व्यायाम भी करे तब भी इस बात को सुनिश्चित रूप से घोषित नहीं किया जा सकता कि हमारी आयु लम्बी होगी किन्तु ईष्या, द्वेष रहित सदाचार भरी आराम दायक जिन्दगी निश्चित ही लम्बी होगी।

आराम करे, उम्र बढ़ाए का नारा निश्चित रूप से शान्त जीवन जीने का सन्देश है। यह सन्देश कहता है लम्बी दूरी की दौड़ दौड़ना व्यर्थ है। इस दौड़ की व्यर्थता दौड़ के अन्त में पता चलती है जब हाथ में कुछ नहीं आता, तब ही दौड़ की व्यर्थता का ज्ञान होता है। इस तथ्य को साहित्यकार शेक्सपियर ने रोमियों -जुलियट में इस प्रकार कहा है’ ’’बुद्धिमता के साथ और धीमे चलों, जो तेज भागते है उन्हे ठोकर लगती है ’’ स्वामी रामतीर्थ ने इसी बात को इस प्रकार कहा है, ’’ सभी सच्चा काम आराम है ’’ इस दृष्टि से जर्मन वैज्ञानिक के शोध पर विचार करेगे तो लगेगा कि अन्धी दौड़ व्यर्थ है। तनाव उत्पन्न करने वाली है। हम घड़ी पहनते भी है और समय की पाबन्दी की बात भी करते है किन्तु कभी घड़ी के कांटे के अनुसार समयबद्ध कार्य नहीं करते क्योकि घड़ी के कांटे को महत्व देने से जीवन में तनाव आता है। काम का अपना महत्व है किन्तु काम के साथ कठोरता का कोई भी तत्व काम के आनन्द को समाप्त कर देता है। यही कारण है कि प्रतियोगिता में उतरे अधिकांश युवा जवानी में वृद्धावस्था की बीमारियों से ग्रसित हो रहे है। कमरदर्द, पीठदर्द, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, हृदय रोग, अवसाद, तनाव आज युवाओं में भी पाया जा रहा है। युवाओं और किशोरों में आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही है। हिन्सा बढ़ रही है जो उनके जीवन में आई निराशा का परिणाम है। इसलिए धीमें चलो, शान्त चलों और लम्बी आयु प्राप्त करो , यही जीवन की सच्चाई है।

आज तक दुनिया में जो भी महत्वपूर्ण मानव कल्याण के शोध हुए है, वैज्ञानिक उपकरण प्राप्त किए गए है वे सब शान्त, एकाग्र, धैर्यपूर्वक निरन्तर किए गए प्रयोगों के फल है। जल्दबाजी में तेजी से कोई भी महत्वपूर्ण कार्य आज तक नहीं हुआ। एक कहावत प्रसिद्ध है जल्दी काम शैतान का। अतः जीवन में यदि कुछ महत्वपूर्ण प्राप्त करना है तो आराम से, तनाव रहित होकर ही पाया जा सकता है। इसलिए यदि कोई वैज्ञानिक शोध कर यह कहता है कि आराम करें, उम्र बढ़ाए तो उस पर विचार किया जाना चाहिए। श्रीमद् भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग की प्रेरणा देते है किन्तु कर्मयोग में भी अन्धी दौड़ के लिए कोई सन्देश नहीं है। हमारी योग्यता, क्षमता, परिस्थिति, वातावरण और शक्ति के अनुसार हम जो अधिकतम पूर्ण गुणवत्त्ता के साथ कर सके, वहीं करने की प्रेरणा उसमें है। अन्धी गलाकाट प्रतियोगिता तो कामना और स्वार्थों के कारण होती है जिसका श्रीभगवत् गीता में निषेध है। किसी भी धर्म ग्रन्थ में इस प्रकार की प्रतियोगिता का समर्थन नहीं है जो हम आधुनिकता के नाम पर अपना रहे है। बाल्मीकि रामायण में कहा गया है जो कर्म के फल का विचार न कर केवल कर्म के लिए दौड़ता है,  उसका फल मिलने के समय उसी प्रकार शोक करता है जैसे ढ़ाक का वृक्ष सींचने वाला करता है। लम्बी उम्र और शान्त जीवन के लिए स्वास्थ पद भोजन और पूर्ण विश्रामदायक नींद ही आवश्यक है जिसके लिए तनावरहित जीवन आवश्यक है। इसलिए व्यर्थ की दौड़ पर विचार कीजिए और आरामदायक चिन्तामुक्त जीवन का प्रारम्भ कीजिए। इससे आपकी उम्र तो बढ़ेगी ही, अन्तरात्मा की आवाज सुनने का समय मिलेगा, सही निर्णय होगे, सफलता आपका इन्तजार करेगी। व्यर्थ की दौड से अन्त में निराशा के सिवाय कुछ भी नहीं मिलता।

Sunday, October 25, 2009

अपनों को धन्यवाद अवश्य दीजिए


श्री छोटेलाल जी मेरे निकट पड़ौसी है और मेरे एकांकी जीवन में हमेशा सहयोगी रहे है। अभी एक दिन मैने उनसे कहा, ’ मुझे सुबह पांच बजे उठ कर यात्रा पर जाना है। क्या आप मुझे उठाने के लिए सुबह टेलीफोन की घण्टी बजा देंगे ? उन्होने हां भरी और ठीक समय पर टेलीफोन की घंटी बज उठी। मैं बिस्तर से उठा, तैयार हुआ और यात्रा पर चल दिया। यात्रा से वापस आने पर मैने उन्हे धन्यवाद दिया। कहा, ’’ आपके सहयोग के द्वारा यात्रा आनन्दमय रही। ’’ जब मैने उन्हे धन्यवाद दिया तो वे बोले, ’’ में टेलीफोन करने के बाद इंतजार करता रहा कि आप जवाब देंगे ,पर आपकी ओर से उत्तर न पाने पर मैं कुछ समझ नहीं पाया।’’ तब मुझे अनुभव हुआ कि मुझे तत्काल धन्यवाद देना था। मुझसे भूल हुई। जब मैने अपने पडौसी को धन्यवाद कहा तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता और संतोष का भाव था। जब भी कोई हम पर उपकार करता है तो हमें एक धन्यवाद का स्वर हृदय से देना ही चाहिए। इसमें कंजूसी कैसी?

यह दुनिया एक दूसरे की सहायता से चलती है। कुछ लोग हमें सहायता देते है, कुछ लोगों को हम सहायता देते है। अपनी अपनी परिस्थिति और योग्यता के अनुसार सहायता का आदान प्रदान चलता रहता है। यह संभव ही नहीं है कि हम बिना किसी सहायता के अपने सभी काम सम्पन्न कर लें। होता यह है कि जब भी कोई अनजान व्यक्ति हमारी सहायता करता है तो हम तत्काल भाव विभोर हो उसे धन्यवाद देते है। उसकी सहायता को हम विस्मृत नहीं करते। सबसे कहते सुनते है पर जब कोई हमारा अपना सहायता प्रदान करता है तो हम मौन रहते है सोचते है यह तो उसका कर्तव्य था। उसने कर्तव्य निर्वाह किया, इसमें कैसा धन्यवाद !

अपनो को भी दे धन्यवाद - यह सही है कि अपनों को शाब्दिक धन्यवाद देने में संकोच होता है। उनकी सहायता स्वभाविक होती है, वे हमसे धन्यवाद की आशा नहीं रखते है। हमारे शरीर के संकेत तो आभार व्यक्त कर सकते है। हमें अपने निकटतस्थ व्यक्तियों का भी हृदय से धन्यवाद ज्ञापन करना चाहिए। धन्यवाद शब्दों से ही नहीं कार्यो से भी दिया जा सकता है। जब भी अवसर मिले हमें अपने कर्तव्य का पालन उचित रीति से कर धन्यवाद देना चाहिए।

हमारे माता-पिता ,पत्नी, पति, भाई ,बहन और अन्य सम्बन्धी हमारे दिन रात कुछ न कुछ करते है। क्या हम उनके उपकारों का ध्यान रखते है ? क्या हम हृदय से उनके आभारी रहते है? मेरा अनुभव है नहीं । अवसर मिलते ही सुनने को मिलता है ’ उन्होने हमारे लिए क्या किया ? जो कुछ उन्होने किया, वह तो उनका कर्तव्य था। सब करते है। हम भी अपने बच्चों के लिए करेंगे। उन्होने कोई एहसान नहीं किया ।’ यह भाव यह बताते है कि हम अपनों को उपकार मानते ही नहीं। जबकि अन्य लोगों के द्वारा छोटे से छोटा किया गया उपकार हमें याद रहता है। यहां तक कि रिश्वत खौर बाबू भी हमसे धन लेकर हमारा जो काम करता है हम उसका भी आभार मानते है पर पडौसी की निस्वार्थ सेवा पर धन्यवाद देना भूल जाते है। अपनों को भी धन्यवाद दे। उन्होने निस्वार्थ भाव से कर्तव्य पूर्ण किये यह क्या कम है। यदि वे अपने कर्तव्य न करंे तब क्या होगा ।

हम अपने निकट संबंधियों को ही नहीं भगवान तक को याद नहीं रखते। भगवान ने भी इस संसार की रचना में हमें अपार आनन्द की सामग्री दी है। ये सूरज, चांद और तारे, ये हवाएं, ये प्रकृति के सुन्दर दृश्य, मौसम, शानदार शरीर ये सब हमारे लिए है। यदि हम न हो तो इन सबका क्या उपयोग ? इसलिए नव विधान में कहा गया है ’ सब बातों के लिए परमात्मा को धन्यवाद दो। इसी तरह व्यक्तित्व विकास के लिए प्रसिद्ध चिन्तक श्री डेल कानगी कहते है ’ जिन बातों के लिए आप कृतज्ञ है उन्ही के विषय में सोचिए और उपलब्ध ऐश्वर्य तथा वैभव के लिए भगवान को धन्यवाद दीजिए ।

होता यह है कि सब कुछ हमारे अनुकूल होते है तो हम प्रसन्न होते है। मौन रहते है, धन्यवाद नहीं देते किन्तु जैसे ही हमारे प्रतिकूल कुछ घटित होता है हम क्रोध से उबल जाते है। दोषारोपण करते है, ध्यान रहे हम सब मानते है कि हमारी कोई भी असफलता, प्रतिकूलता का कारण हम नहीं है, कोई और है। हम हमेशा बहाने बनाकर दोषारोपण करते है और असफलता और अनुकूलता के समय हम दूसरों के उपकारों को भूल जाते है।

अतः अपने ऊपर किये गये छोटे से छोटे उपकार को स्मरण रखिये। धन्यवाद दीजिए और अवसर आने पर वैसी ही सेवा देकर आनन्द दीजिए। यह संसार एक दूसरे की सहायता से ही चलता है। इस संबंध में नीतिशास्त्र के रचियता तिरूवल्लुवर के इस कथन पर ध्यान दीजिए ’ तृणतुल्य भी उपकार क्यों न हो उसके फल को समझने वाले उसको ताड़ के समान मानेंगे। ’

भलाई करना हमारा धर्म है। इसी प्रकार प्रत्युत्तर में धन्यवाद देना, आभार मानना भी हमारा स्वभाव है, कर्तव्य है, यदि हम इस कर्तव्य को पूर्ण नहीं कर पायेंगे तो कल जब हम पुनः किसी से सहायता चाहेंगे तो हमें सहायता नहीं मिलेगी। यह ईशवरीय नियम है। हमें यह सोचना चाहिए कि जितना उपकार हमारा हुआ है उससे अधिक उपकार हमें करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। महाभारत में वेदव्यासजी कहते है ’ दूसरा मनुष्य जितना उपकार करें उससे कई गुना अधिक प्रत्युतर स्वयं उसके प्रति करना चाहिए ।

धन्यवाद की आशा मत कीजिए - भलाई करना हमारा स्वभाव है। धर्म है, अतः हमें जब भी अवसर मिले हम प्राणी मात्र के प्रति उपकार करें। यह हमारी आदत होना चाहिए क्योकि हमें आभार या धन्यवाद की आशा नहीं करना चाहिए क्योकि मानव स्वभाव आभार मानने को सदा तत्पर नहीं होता । धन्यवाद का इन्तजार मत कीजिए अन्यथा आपको, हमको निराश होना पडेगा। अमेरीकी लेखक और वक्ता डेल कार्निगी कहते है ’ उपकारों का भूलना मनुष्य का स्वभाव है। अतः यदि हम दूसरों से कृतज्ञता की आशा करेंगे तो व्यर्थ ही सरदर्द मोल लेना पडेगा ।’

इसलिए सबसे उत्तम मार्ग है कि हम तृण मात्र भलाई के लिए तत्काल धन्यवाद करें और जब भी अवसर मिलें सब भलाई करने को तत्पर रहें । विशेष बात यह है कि इसमें अपनों को भी याद रखें और उन्हे भी धन्यवाद दे।

Thursday, October 22, 2009

एक हाथ से ताली कभी नहीं बजती



मैं एक परिवार में मेहमान था । रात्रि के भोजन के बाद मैं बिस्तर पर विश्राम के लिए पहुँचा। थोड़ी देर बाद मुझे पास के कमरे से पति पत्नी के वाकयुद्ध के स्वर सुनाई दिए। ये स्वर बड़ी तीव्र गति से बढ़ रहे थे। थोड़ी देर बाद वे दोनो लड़ते हुए कमरे के बाहर आ गए। पत्नी ने पति को गाली दी। पति ने एक चांटा रसीद कर दिया। पत्नी ने पास में पड़ी झाडू उठा ली और झगड़ा बढ़ता जा रहा था। मैने पति को डांटा, वह चुपचाप चला गया। पत्नी सुबकते हुए मेरे पास बेठी। थोडी देर बाद वह उठी और वह भी चली गई फिर रात शान्ति से बीती।

इस जोडे को विवाहित हुए दस वर्ष हो गए है। दोनो उच्च शिक्षा प्राप्त है। दोनो अच्छा वेतन पाते है। सुख सुविधा के सब साधन है। एक पाँच वर्ष का बेटा है फिर भी यह ‘गृह युद्ध’ हुआ जो निश्चित ही अशोभनीय था। विशेषकर जब एक वृद्ध मेहमान ठहरा हुआ था किन्तु ऐसा पत्नी पति के बीच होता है। दूसरे दिन वे प्रसन्नचित्त काम पर गए। हमारे देश मे महिलाओं को घरेलु हिंसा के विरूद्ध एक अधिनियम बना हुआ है उस पत्नी ने उस अधिनियम का उपयोग नहीं किया।

घरेलु झगड़े स्वभाविक - हमारे देश में एक कहावत है कि जहाँ पाँच बरतन होगे वहाँ बरतनों की आवाज होगी। यह आवाज होना स्वभाविक ही है। इस पर चिन्ता का कारण नहीं है। इसे अपराध की कोटि में नहीं मानना चाहिए। देखिए क्रिकेट के मैदान में जहाँ हजारों दर्शक होते है खिलाडियों के बीच नोक झोंक होती ही है । अब उसकी शिकायते होने लगी है । इस सम्बन्ध में क्रेग मैकमिलन न्यूजीलैण्ड के पूर्व आलराउण्डर क्या कहते है ’’ क्रिकेट मैदान पर खिलाडियों के बीच थोडी कहासुनी और टिकाटिप्पणी पर प्रतिबन्ध लगाने से खेल का मजा ही खत्म हो जाएगा। खिलाडी रोबोट की तरह हो जाएगे और खेल मशीनी तंत्र का हिस्सा।’‘

पति-पत्नी के बीच भी ‘थोडी सी ’ कहासुनी ऐसी ही घटना है। उनकी कहासुनी प्रेम-अपनत्व की सूचक है। यदि यह न हो तो फिर परिवार का आनन्द ही समाप्त हो जाएगा। फिर तो पति-पत्नी मशीन की तरह मुस्कराते रहेगे। जिन्दादिल लोगो के बीच कुछ खटपट होना  स्वभाविक है। एक शायर ने इसका क्या खूब वर्णन किया है।

‘बदजायका है शरबत, गर तुर्रषी न हो।
 बिसाले यार में भी चाहिए तकरार थोडी सी।।

तुर्रषी कहते है खटाई को । यदि शरबत में खटाई न हो तो शरबत बेस्वाद होता है ऐसे ही प्रेम में यदि तकरार न हो तो वह प्रेम भी बेस्वाद हो जाएगा। सही है तब पति-पत्नी रोबोट की तरह मशीनी जिन्दगी जिएगे। लेकिन इसमें सब महत्व की बात है ‘थोडी सी ’।

बढ़ती हिंसा - यह ‘थोडी सी ’अब मर्यादा लांघ रही है। पति -पत्नी के झगडे अदालत तक जा रहे है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रेणुका चैधरी ने लोक सभा में एक लिखित बयान में बताया कि सन् 2005 में घरेलु हिंसा के 102 मामले दर्ज हुए थे, वही 2007 में 364 मामले दर्ज हुए। ये मामले तीन गुना बढ़ गए। इन मामलों का अदालत तक जाना एक विचारणीय विषय है । वैसे इतने विशाल देश मे यह संख्या अधिक नहीं है पर इनकी संख्या में वृद्धि विचारणीय तो है ही। हमें यह निसंकोच स्वीकार करना चाहिए कि पश्चिम की सभ्यता के प्रभाव के कारण तथा उपभोक्तावाद के कारण ‘गृहस्थ आश्रम ’ अब नहीं रहा। संयुक्त परिवार बिखर गए और व्यक्तिवाद का विचार चल पड़ा है। इसी कारण भले ही घरेलु हिंसा के मामले विकराल रूप से सामने न आए हो किन्तु तलाक की प्रवृति बढ़ती जा रही है। पति-पत्नी में विष्वास के सम्बन्ध कमजोर हो गए है। एक दूसरे के प्रति संषय बढ़ता जा रहा है। पति-पत्नी आपस में हत्या तक करा रहे है। ये घटनाएं हमें चेतावनी देती है कि ये सम्बन्धों की कडी कमजोर हो रही है। इसके क्या कारण है उस पर विचार किया जाना समय की आवष्यकता है।

क्या है कारण - एक समय था जब स्त्री का पक्ष कमजोर माना जाता था। आज स्त्री पुरूष समानता को हम स्वीकार कर चुके है पर अभी भी हमारी मानसिकता नहीं बदली है स्त्री के प्रति जो सम्मान होना चाहिए वह उसे नहीं मिलता। ठीक ऐसा ही पुरूष अनुभव करते है। वे कहते है कि महिलाओं के पक्ष में कानून बन जाने के कारण इनका दुरूपयोग हो रहा है और महिलाएं और उनके परिजन इनके आधार पर हमेशा भयभीत करते रहते है।

विवाह का आधार प्रेम है। प्रेम हो तो सम्मान बना रहता है जब प्रेम का अभाव होता है और अहंकार का उदय होता है तो विवाद प्रारम्भ हो जाते है। दूसरे की कमजोरियों का पता चल जाता है और तब फिर वह प्रेम ठहर नहीं पाता और विवाद उजागर होने लगते है। इस दुनिया में कोई भी एकदम पूर्ण नहीं होता। हम सब कमजोरियों के पुतले है। अपने प्रेमी की समस्त कमजोरियों के साथ उसे चाहने का नाम ही तो प्रेम है इसलिए सब झगड़ों की जड़ प्रेम अभाव है। हम विवाद के लिए चाहे जितने कारण बताए पर मूल कारण एक ही है।

प्रेम के अभाव के कारण - विवाह के प्रारम्भ में प्रेम हो और बाद में अभाव पैदा हो तो उसके क्या कारण हो सकते है -विचार कीजिए।
  1. आज कल विवाह पूर्ण वयस्क होने की अवस्था में होता है। इस अवस्था तक परिवार में जो संस्कार मिलते है उसका वैवाहिक जीवन पर बड़ा प्रभाव रहता है। हम अधिकारों को जानते हुए वयस्क होते है। कर्तव्य तो विचारते ही नहीं। गृहस्थ आश्रम में कर्तव्य ही अधिक होते है। कर्तव्य पालन करने के बाद ही अधिकार आते है। अधिकारों की घोशणा और कर्तव्यों व दायित्वों पर आँख मुदना ही विवाद का कारण होता है। इसके बीच एक छिपा अहंकार रहता है कि मैं सर्वश्रेश्ठ हूँ। मैं क्यों दबू। इस चक्कर में एक दूसरे के दोष खोजे जाते हैं। उन्हें उजागर किया जाता है। एक दूसरे पर दोष  लगाए जाते है। यदि कोई स्वंय को समझदार समझे तो कोई हर्ज नहीं लेकिन अधिकारों की द्योषणा के साथ दूसरे को मूर्ख समझना झगड़े की जड़ बन जाता है। आपका साथी जैसा भी है वह आदर का पात्र है पर  समानता के नारे के साथ यह आदर देना हम भूल रहे है। मित्रता में भी समानता रहती है। मित्रता भी बिना आदर के नहीं रह सकती पर ये संस्कार अब परिवार में नहीं दिए जाते है अब ये संस्कार सीखती है टी.वी. चैनल्स से, मित्रों से, पत्र-पत्रिकाओं से और यहाँ सीखने के लिए बहुत कुछ नहीं होता। एक परिवार में भोजन खाने के बाद  झूठे बर्तन टेबल पर पड़े रहते हैं। उन्हे उठाना ये सब परिवारों में नहीं चलता। परिवार होटल नहीं है। वहाँ प्रेम अपनत्व होना चाहिए। इन छोटी छोटी बातों पर भी युद्ध छिड़ जाता है।
  2. इस वातावरण में शान्ति स्थापना के लिए कोई नहीं होता। हाँ आग लगाने के लिए एक तृतीय पक्ष रहता है। जो मायका या ससुराल होता है। ये पक्ष अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए भड़काऊ क्रिया कलाप पैदा करता है। इस तृतीय पक्ष में पुलिस और अभिभाषक वर्ग का भी सहयोग मिल जाता है और तब आग में घी डालने के लिए कई धाराएं, तर्क, घटनाएं उपस्थित हो जाते है जिनका वास्तव में होना पाया ही नहीं जाता।
  3. इस समय तक युवा पति पत्नी को सही मार्गदर्शन देने के लिए परिवार का कोई बुजुर्ग नहीं होता जिसके प्रभाव से दोनो के मध्य प्रेम के बीज बोए जाए। हमने बुजुर्गो को तो दुश्मन मान परिवार संस्था से बाहर निकाल ही दिया है । तब वे  कहाँ से उपस्थित हो। पति -पत्नी के झगडो के लिए किसी न्यायालय की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं अपनी समस्या हल करे। यदि वे  समस्या हल न कर पाए तो परिवार के बुर्जग समस्या का हल खोजे। यदि उनसे भी हल न हो तो न्यायालय अन्तिम चरण हो सकता है लेकिन इस स्तर पर पर भी बीच मे अभिभाषकों की आवश्यकता नहीं है ये प्रेम का सौदा है इसमें कानूनी तर्क वितर्क नहीं, आपसी समझ ही काम आना चाहिए।
  4. आज परिवारों के टूटने में भोजन बनाने के प्रति अरूचि भी एक कारण है। भोजन बनाने का शिक्षण दिया ही नहीं जाता। दिया जाता है तो सतही तौर पर जब कि भोजन जीवन के लिए अनिवार्य है और उसकी विविधता और मर्म जानना स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। रसोई हमारे जीवन के केन्द्र में है। हम कामवाली महिलाओं के भरोसे नहीं चल सकते। उनका सहयोग लेना ठीक है लेकिन उन पर निर्भर होना परतंत्रता है। आज युवक युवतियों को केवल पढ़ना, अच्छे अंक लाना, उचे वेतन की नौकरी या व्यवसाय करना सिखाया जाता है। भोजन व रसोई घर के प्रति यह उदासीनता पति पत्नी के बीच विवाद पैदा कर देता है। अच्छे भोजन का हमारे स्वास्थ और मन से भी सम्बन्ध है।
  5. सच बात यह है कि परिवार चलता है सेवा, त्याग, प्रेम आपसी सम्मान से। यही गृहस्थ आश्रम की मूल आधार भूमि है। आश्रम के संबंध में संस्कृत विद्वान भोलानाथ शर्मा कहते है  ‘जिस प्रकार अन्न की उत्पत्ति के लिए आर्दश बीज भंडारों की आवष्यकता होती है। उसी प्रकार मानव विकास के लिए श्रद्धालु संतोषी एवं दृढ़वती व्यक्तियों के आश्रमों की आवष्यकता होती है।’ इन गुणो के कारण ही दोनों पक्षों में प्रेम पनपता है। इसमें कोई भी एक पक्ष स्वंय को श्रेष्ठ माने और दूसरे को हीन तो यह अंहकार क्रोध उत्पन्न करेगा ही। गीता में क्रोध को नरक का द्वार बताया है। यदि एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव न होगा तो फिर विवाह का कोई अर्थ नहीं है।
झगड़ों से उपजे परिणाम- परिवारों मे जो झगड़े बढ़ रहे है उसके दुःखद परिणाम उभय पक्ष को भुगतने पड़ते है। सबसे अधिक संकटग्रस्त होते हैं बच्चे। वे अपने को असुरक्षित समझ भयभीत रहते हैं। उनको परिवार में प्रारंभ से ही गलत संस्कार मिल जाते हैं। फलस्वरुप ऐसे बच्चे बड़े होकर असामाजिक और हिंसक हो जाते है। वे समाज में समस्याए पैदा करते है। अपराध बढ़ाते है उनका संबंधो में विश्वास नहीं रहता।

परिवार में पति पत्नी के बीच विवाद, तनाव, डिप्रेशन तो लाता ही है, यह भी अविश्वास का वातावरण निर्मित करता है। इन्हीं क्षणों में पति पत्नी और ‘वो’ का उदगम होता है। आज यदि पति संशय में पत्नी की हत्या कर रहा है और पत्नी पति की हत्या कर रही है। तो इसका कारण यह संशय और ‘वो’ तत्व ही है। संशय की दवा लुकमान हकीम के पास भी नहीं है। संदेह क्या क्या कर सकता है इस संबंध मे सुनिए अंग्रेज निबंध लेखक फ्रांसिस बेकन क्या कहते है, ‘विचारों में संदेह पक्षियों में चिमगादड़ो के समान होते है। वे सदा धुन्धले प्रकाश में ही उड़ते है। निसंदेह उन्हें दमित किया जाना चाहिए या कम से कम उनसे बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे मन पर आवरण डाल देते है। मित्रो को गंवा देते है। व्यापार रुद्ध कर देते है। राजाओं को अत्याचार की ओर प्रवृत्त कर देते हैं, पतियों को इश्र्यालु बना देते हैं और बुद्धिमानों को अनिश्चयशील तथा उदासीन बना देते है। वे हद्धय के नहीं, मस्तिष्क के  दोष है।’

संशय से उपजे आपसी विवाद अवसाद के क्षणों में आत्महत्या की ओर भी प्रवृत्त करते है। इसका एक अन्य परिणाम भी प्राप्त होता है जिस पर हम  ध्यान नहीं दे पाते। संशय, तनाव, अवसाद, के कारण हमारी कार्यक्षमता और उत्पादन क्षमता पर भारी प्रभाव पड़ता है। हम अपना कोई भी कार्य मन लगाकर नहीं कर पाते। हम मानसिक रुप से भयग्रस्त हो जाते है। इस मानसिक स्थिती का हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है और हम उच्च रक्तचाप, हद्धय रोग से भी प्रभावित  हो जाते है। प्रसिद्ध अंग्रेज निबंधकार बेकन कहते है, ‘मन अपने ही सौन्दर्य  से रोगग्रस्त रहता है।’ ये बीमारियाँ महज आपसी विवाद के कारण होती है।

तब क्या करें? - इस दुनिया मे कोई भी पूर्ण नहीं है। हम सबमे दोष तो है ही। इसलिए साथ रहते रहते जिन दोषो को हम अपने साथी में पाए उन्हे स्वीकार करे। दोष ढूंढने के बजाय  गुणों की ओर ध्यान दें। हर व्यक्ति में गुण भी रहते हैं। समय समय पर उन गुणों की प्रशन्सा करें। अवगुण व दोषो को सुधारने के लिए प्रेम पूर्वक प्रयत्न करें।

यदि हमसे कभी भी जाने अनजाने गलती हुई है तो उसे तुरन्त स्वीकार करें। क्षमा माँगे। दुनिया में ऐसी कोई भी गलती नहीं है। जिसे क्षमा न किया जा सके।

अपने परिजनों का तो सम्मान सभी करते है। अपने साथी के परिजनों का भी हद्धय से सम्मान करे। जब भी समस्या उत्पन्न हो तब आपस में बैठकर धैर्य पूर्वक समाधान खोजे। अपनी समस्या के लिए किसी तीसरे पक्ष को मध्यस्त बनाने की भूल न करें। यदि समस्या का समाधान न मिले तो परिवार के बुजुर्गो से अवश्य सलाह लें।

समस्याएं हमेशा रहेगी। हम तलाक ले ले तब भी समस्याएं हमारा पीछा नहीं छोडे़गी। समस्याओं से भागना नहीं है, उनका साहसपूर्वक समाधान खोजना है। यदि आप ऐसा करेंगे तो समस्या में से समाधान निकल आएगा। इस संबंध में जिम डारमेन एक सूत्र बताते है। इस पर ध्यान दीजिए। यह सूत्र हमें याद दिलाता है कि लोगों के साथ व्यवहार करते समय हमारी प्राथमिकताएं क्या होना चाहिए।

सबसे महत्वहीन शब्द है ’मैं’। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है ’हम’। सबसे महत्वपूर्ण दो शब्द ‘‘आपको धन्यवाद’’ सबसे महत्वपूर्ण तीन शब्द ‘‘सब माफ किया’’ सबसे महत्वपूर्ण चार शब्द ‘‘आपका क्या विचार है’’ सबसे महत्वपूर्ण पाँच शब्द ‘‘आपने बहुत अच्छा काम किया‘‘ सबसे महत्वपूर्ण छह शब्द ‘‘मैं आपको बेहतर समझना चाहता हूँ’’।

अपने नजरिए को बदलकर आत्मकेन्द्रीयता से समझने की स्थिती तक जाया जा सकता है। बस इसमें इच्छा और संकल्प की आवष्यकता होती है। जिससे हम स्थिती को दूसरे व्यक्ति के दृश्टिकोण से देखने की कोशिश करें।

यह है समस्या का हल। जब भी विवाद, झगड़ा संघर्ष होता है दोनों पक्षों की गलतियाँ होती है। एक हाथ से कभी ताली नहीं बजी। अतः उभय पक्षों को इस पर विचार करना चाहिए।

Monday, October 19, 2009

आस्था की शक्ति को पहचाना विज्ञान ने


जीवन में सुख शान्ति और आनन्द के साथ सफलता का मार्ग दुनिया भर में खोजा गया है। हर धर्म में यह प्रयत्न हुआ है और मार्ग खोजने में प्रक्रियागत विविधता चाहे जितनी रही हो किन्तु हम गहराई से विचार करें तो पाते है कि अन्तिम मंजिल एक ही है। श्रीमद्भभगवद् गीता में इस मार्ग के लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग जैसे मार्ग सुझाए है किन्तु अन्त में वे सब पहुँचाते है ईश्वर के पास जहाँ सुख शान्ति और आनन्द है। इन मार्गो पर चलने वाले राही के लिए निष्काम भाव से कर्म करना एक अनिवार्य शर्त है। हमारे कर्म कामना रहित, स्वार्थरहित होना चाहिए। श्रीमद् भगवद् गीता यज्ञमय जीवन जिने का सन्देश देती है। यह संसार भगवान का ही रूप है। इसकी सेवा निस्वार्थ भाव से परोपकार के लिए करो, न नाम चाहो, न यश चाहो न धन चाहो और न पद चाहो। अपने कर्म ईश्वर अर्पण कर दो, यह सन्देश है गीता का।

आज के इस प्रतियोगिता के युग में क्या यह सन्देश व्यवहारिक है ? ऐसे सन्देश से सफलता कैसे प्राप्त होगी ? यह प्रश्न उठाया जाता रहा है। हमने कामनाओं और ईच्छाओं से भरे इस संसार में गला-काट प्रतियोगिता देखी है और अन्त में पाया है कि हम सुख शक्ति से कोसो दूर है। दुनिया के धर्म हमें भोगेच्छा से दूर ईश्वर सर्मपण का सन्देश देते है। तब यह विचार स्वभाविक ही उठता है कि ईश्वर कैसे हमें सुख शान्ति और सफलता दिला सकता है।

शायद यह प्रश्न गीता के अमर गायक भगवान कृष्ण जानते थे। इसलिए गीता में वे आश्वासन देते है कि यदि तुम अपने कर्म, कर्मफल मुझे समर्पित कर दोगे तो मैं तुम्हारा योग क्षैत्र का ध्यान रखूगा। देखिए कितना स्पष्ट आश्वासन है यह। भगवान कहते है ’ जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए, मेरी भली भांति उपासना करते है, मुझ में निरन्तर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम ( अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्ति की रक्षा) मैं वहन करता हूँ ’ भगवान की उपासना जिसने अपने कर्मो द्वारा अनन्य भाव से की है उसे ही यह वचन है। दुनियावी लोभ, लालच और कामनाओं के मध्य आरती उतारते-गीत गाते, प्रसाद बाटते भक्त के लिए यह वचन नहीं है।

हिन्दू धर्म के साधु सन्त ही नहीं, इस्लाम और ईसाई धर्म के सन्तों ने भी समर्पण भाव से कर्म द्वारा ईश्वर की इस उपासना का ज्ञान वितरित किया है। इसे हम आस्था का स्वर कह सकते है। यह उपासना या आस्था कैसे काम करती है। इसे वैज्ञानिक तुला पर अभी तक तोला नहीं गया था किन्तु अब विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है कि ईश्वर की इस प्रकार उपासना व्यक्ति में बल पैदा कर देता है कि वह अपने मार्ग पर शिखर पर पहुँच जाता है।

इस समबन्ध में हम स्वामी विवेकानन्द का स्मरण कर सकते है जिन्होने निष्काम भाव से दुनिया में धर्म का डंका बजाकर सब धर्मालम्बियों में निष्काम भाव से सेवा करने की प्रेरणा उत्पन्न की। यह बहुत पूर्व का उदाहरण नहीं है।

हमारे अपने समय में मदर टेरेसा का उदाहरण भी हमारे सामने है जिन्होने निष्काम भाव से दीनो, दुखियों और असहायों के लिए सहायता का हाथ बढ़ाया, उनमें आशा की किरण जगाई, उन्हे प्रेम व सम्मान दिया और ऐसा करते हुए एक विराट आयोजन रच डाला। वे दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गई। करोडो डालरों की सहायता के उपक्रम आज दुनिया में उनके नाम से उनके बताए मार्ग पर चल रहे है। उनका अपना व्यक्तिगत कुछ भी शेष नहीं रहा। आप इसे प्रभू ईसा का मार्ग कहें या कृष्ण का पर है वह एक मार्ग। भगवान कृष्ण ने जो गीता में वचन दिया है उसकी पूर्ति होती ही है। वह वचन पूर्ण होगा, शर्त केवल एक है कि हम अनन्य भाव से ईश्वर का चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से ईश्वर की उपासना करे।

इस सम्बन्ध में हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी याद करे। वे भगवद् गीता को माता कहते थे। जब भी उन्हे समस्या उत्पन्न हुई उन्होने गीता माता की गोद में सर रख दिया और उन्हे मार्ग मिल गया। वे मृत्यु पर्यन्त राम नाम का स्मरण करते रहे। ईश्वर के प्रति इस आस्था के सम्बन्ध में वे कहते है ’’आस्था तर्क से परे की चीज है जब चारों और अंधेरा ही दिखाई पड़ता है और मनुष्य की बुद्धि काम करना बन्द कर देती है उस समय आस्था की ज्योति प्रखर रूप से चमकती है और हमारे मदद में आती है’’

गांधीजी का अनुभव - पूज्य महात्मा गांधी ने जो कहा यह उनका अनुभव है। इसे वे कई बार आजमा चुके है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में उन्होने आस्था के इस चमत्कार को देखा है। उनका ईश्वर की शाक्ति पर पूर्ण विश्वास था। इसी ने उन्हे अन्तिम समय तक साथ दिया। भगवान अपना वचन निबाहते है इसे तर्क से तो सिद्ध नहीं किया जा सकता किन्तु इसका अनुभव लिया जा सकता है।

उदाहरण - गांधी ने छुआछुत के विरूद्ध युद्ध छेड दिया था। उन दिनों दलित जातियों के प्रति सवर्णो का भेदभाव प्रभावशाली था अतः कुछ उच्च वर्ग व व्यापारी वर्ग नाराज हो गया। साबरमती आश्रम को मिलने वाली आर्थिक सहायता बन्द हो गई। आश्रम संचालन में कठिनाईयों की आशंका हुई तब महादेव भाई ने गांधीजी को सुझाव दिया कि आश्रम की सहायता के लिए अपील निकाली जाए। गांधीजी ने इन्कार कर दिया कहा - इसकी आवश्यकता नहीं है। ईश्वर इसकी व्यवस्था करेगा। आश्चर्य उसी दिन एक सज्जन आश्रम आए और आश्रम के लिए दस हजार रूपए की सहायता दे गए। गांधीजी की ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा थी। एक बार गांधीजी मनु बहन के कन्धे पर हाथ रख चल रहे थे, कमजोरी के कारण वे लड़खडाए। मनु बहन को लगा कि गांधीजी गिर पडेंगे। सम्हलेंगे नहीं मनु बहन ने एक सहयोगी को आवाज दी, गांधीजी को सम्हाल लिया गया। बाद में गांधीजी ने मनु बहन से कहा- ’सहयोगी को आवाज लगाने के बजाय राम को पुकारा होता। संकट में राम ही मदद करता है’ गांधीजी की इतनी असीम आस्था थी ईश्वर के प्रति। गांधीजी की यह आस्था वे खुले में स्वीकार करते थे।

वैज्ञानिक सत्य है आस्था - अभी तक विज्ञान आस्था पर विश्वास नहीं करता था किन्तु अब विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है कि आस्था में शक्ति है इसलिए अपने लक्ष्यों को पा लेते है धर्म में विश्वास रखने वाले आस्थावान अपनी भावनाओं और व्यवहार पर काबू रख लेते है। वे अपने लक्ष्य को पाने के लिए लगातार प्रयास करते है और लक्ष्य को पा ही लेते है।

यूनिवर्सिटी आँफ मियामी के साइकोलाजी विभाग के प्रोफेसर मैककुलफ ने आठ दशकों तक धर्म पर अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला। वे कहते है कि जब लोग मानते है कि उनका लक्ष्य बहुत पवित्र है तो वे उसे प्राप्त करने में अधिक उर्जा लगाते है और उसके लिए कडे प्रयास करते है। धार्मिक गतिविधियां जैसे पूजा या प्रार्थना करने, ध्यान लगाने आदि का प्रभाव मानव मस्तिष्क के उस भाग पर पड़ता है जो स्वयं पर नियंत्रण के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है क्योकि वे मानते है कि भगवान उन्हे देख रहा है।

ईश्वर पर गहरी आस्था व्यक्ति को आत्मविश्वासी बना देती है। शक्ति प्रदान करती है और वह, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जो वह पाना चाहता है। भगवान कृष्ण श्रीमद् भगवद् गीता के द्वारा यही सन्देश देते है। आस्था के स्वर हमें ईश भक्ति के लिए प्रेरणा देते है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails