Friday, October 16, 2009

रसोईघर है जीवन दर्शन की प्रयोगशाला


पिछले दिनों मैं मुंबई गया तो वहां मुझे अपनी भतीजी मिली। वह इंजीनियरिंग कर रही है। मैंने उसे चाय बनाकर लाने को कहा। वह बोली, चाय बनाना तो मैं नहीं जानती। मैं आश्चर्यचकित रह गया। जो चाय बनाना न जानता हो, उससे भोजन के संबंध में बात करना ही व्यर्थ है।

आजकल हम परिवार में रसोईघर के काम को बहुत कम महत्व देते हैं। हमारा सारा ध्यान पढ़ने, लिखने और करियर बनाने की ओर होता है। अच्छा भोजन तो बना-बनाया भी मिल जाता है- एक फोन करो, घर-दफ्तर जहां चाहो गरमा-गरम टिफिन उपस्थित। डिब्बाबंद भोजन भी उपलब्ध है, खोलो, गरम करो और खाओ। फिर दुनियाभर के कष्ट उठाकर किचन में समय बर्बाद करने का क्या अर्थ है?

असल में गृहस्थ आश्रम में रसोईघर है जीवन दर्शन की प्रयोगशाला। हमारी भारतीय संस्कृति में रसोई को बहुत महत्व दिया गया है। क्या खाना चाहिए, कैसा खाना चाहिए, किस विधि से पकाना चाहिए। रसोई की सफाई पर अत्यधिक बल दिया जाता था। यह सब अकारण नहीं है।

हमारे स्वास्थ्य पर भोजन का शत प्रतिशत प्रभाव पड़ता है। हमारे ऋषि मुनियों ने इसीलिए अन्न को ब्रह्मा कहा है। गीता में भोजन के सात्विक, राजस और तामस जैसे भेद किए गए हैं। तामस भोजन जिसे हम फास्ट फूड कहते हैं, गीता के अनुसार आलस और नींद लाता है। यह हमारी कार्य क्षमता को घटाता है। हमारे उत्साह, उमंग और प्रसन्नता में बाधक बनता है।

भोजन पकाने की जो एकाग्रता है, वह मन के तनाव को समाप्त करती है और हमें धैर्यवान बनाती है। यह एक ऐसी गतिविधि है जो तत्काल फल और संतुष्टि देती है। भोजन पकाने का काम प्रबंधन के गुर सिखाता है -आधुनिक प्रबंधन के गुर। इसीलिए वह परिवार को बांध कर रखता है।

गृहस्थ आश्रम में बच्चे प्रेम, त्याग, सहयोग, अपनत्व के गुण सीखते हैं। इस आश्रम में से आप यदि रसोई के केन्द्र को हटा दीजिए तो वह आश्रम वाली परिभाषा खो देगा। आश्रम शब्द में ही श्रम निहित है। बिना श्रम किए भोजन का भोग करना प्रकृति के विरुद्ध है।

गृहस्थ आश्रम एक तपस्या है। रसोईघर उसका केन्द्र है। भोजनशाला जीवन की वास्तविक शाला है, जहां जीवन का दर्शन तैयार होता है। यह दर्शन परिवार को साथ-साथ रहने, एक-दूसरे के लिए त्याग करने, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद जानने और साथ सुख-दुख भोगने की शिक्षा देता है। यह दर्शन जीवन जीने की कला सिखाता है।

भोजन शास्त्र में अतिथि, पशु, कुत्ता, गाय आदि का भी भाग है जो हमें प्रकृति से जोड़ता है। यह हमें परोपकार रूपी यज्ञ की प्रेरण देता है। यह ईश्वर की याद दिलाता है और जीवन को यज्ञ बनाता है। भोजन का दर्शन, हमारे जीवन दर्शन का सहज और सगुण रूप है।

आप विचार कीजिए, इस भोजन और स्वास्थ्य को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अनेक प्रयोग क्यों किए। स्वाद पर नियंत्रण उन्होंने अध्यात्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। हमारे प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री अपनी धर्मपत्नी द्वारा तैयार भोजन ही करते रहे। भोजन का आनंद ताजे और हल्के भोजन में है। इस बात को आज के प्रसिद्ध व सफल कुश्तीबाज खली भी स्वीकार करते हैं। वह कहते हैं कि वह घर में पत्नी के हाथ का बनाया भोजन ही करते हैं, होटल में भोजन नहीं करते।

हमारे देश में यह भ्रम पाया जाता है कि भोजन पकाना सिर्फ महिलाओं का काम है। महाभारत काल में जब पांडवों को अज्ञातवास में समय व्यतीत करना पड़ा तब ध्यान दीजिए, रसोइए का काम भीम ने ही संपन्न किया, द्रौपदी ने नहीं।

राजा नल के विवाह के पहले देवता उनसे प्रसन्न होकर वर देते हैं कि वह अच्छे पाकशास्त्री होंगे। एक राजा का पाकशास्त्र से क्या संबंध हो सकता है? विचार कीजिए। इस वर का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन जैसे शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए। भगवान कृष्ण के समय जो 64 कलाएं शिक्षा में दी जाती थीं, उसमें भोजन पकाना शामिल था।

Wednesday, October 14, 2009

यदि राम को वनवास नहीं हुआ होता


राम को चौदह वर्ष का वनवास माता कैकई के आदेश से राजा दशरथ ने दिया। कोई भी ऐसा आदेश प्रथम दृष्टि में दंड माना जाता है। राम, राजा दशरथ के सबसे बडे़ बेटे थे। परम्परा के अनुसार उनका राजतिलक होना चाहिए था। राजतिलक की तैयारी भी थी, किन्तु इसी बीच दासी मन्थरा के षडयंत्र पूर्ण मंतव्य को सुन माता कैकई अपने पुराने वर के रूप में राम का वनवास मांग लेती हैं। और राजा दशरथ को न चाहते हुए भी विवश भाव से उसे स्वीकार करना होता है।

राम राजा बनते-बनते वनवास के लिए सहर्ष प्रस्थान कर जाते हैं। इसे हम क्या कहेंगे? यदि हमारे साथ ऐसा कुछ घटित हो तो हम उसे आज किस रूप में ग्रहण करेंगे? क्या वनवास चले जाएंगे? क्या दुनिया उसे दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कहेगी? यह प्रश्न है।

राम का वनवास सम्पूर्ण रामायण की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। विचार कीजिए कि यदि राम चन्द्र को वनवास नहीं मिलता तो रामायण की कथा क्या होती? क्या यह कथा अपना दम नहीं तोड़ देती? राम के राज्याभिषेक के बाद तो जो भी कथा बनाई जाती, वह सिर्फ राजा राम की ही होती।

लेकिन रामायण की कथा एक जन नायक की कथा है, जो दुर्भाग्य के क्षणों में भी संघर्षरत रह कर सभी नैतिक मूल्यों को बरकरार रखता है। अपने या समाज के मूल्यों पर कहीं समझौता नहीं करता। उन्होंने वनवास को दुर्भाग्य नहीं माना। अपने आचरण से उन्होंने यह बताया कि जीवन में सब कुछ अनुकूल नहीं होता। अनुकूल का जुड़वां भाई है प्रतिकूल। परिवर्तन चक्र में एक के बाद दूसरे का आना स्वाभाविक है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। सुख है तो दुख आएंगे ही। वसन्त है तो पतझड़ का इन्तज़ार कीजिए। दिन है तो रात भी आएगी।

राम ने पिता के आदेश का सहर्ष पालन कर प्रकृति के इस नियम को स्वीकार किया है। गीता में इसे ही समता योग कहा गया है। गीता कहती है, समता योग उच्चते (2/48)। खराब से खराब समझे जाने वाले समय की भी जीवन में उपयोगिता है।

दुर्भाग्य भी पाठशाला है- हमारा सामान्य अनुभव यह है कि जीवन में दुर्भाग्य की पाठशाला में जो भी प्रवेश करता है, वह पहले तनावग्रस्त होता है। अवसाद उसे घेर लेता है। वह निराश-हताश हो जाता है।

लेकिन राम दुर्भाग्य के इन क्षणों को पहले से पहचानते थे। उन्हें अनुभव था वनवास का। वे जानते थे क्या होता है वनवास में। और कुशलतापूर्वक इन परिस्थितियों से कैसे निपटा जाता है। वे जानते थे कि कांटों की झाड़ियों में भी पुष्प खिलते हैं। जंगल में भी फल-फूल हैं। हरियाली, पक्षियों का संगीत है और इस दुनिया का आनन्द लिया जा सकता है। दुखद क्षणों को सुखद क्षणों में बदलने का धैर्य ही वह कौशल है जो राम का वनवास हमें सिखाता है।

वनवास में क्या मिला राम को - राम को चौदह वर्ष का वह वनवास एक शिक्षालय के रूप में मिला। वे जान पाए एक सामान्य वनवासी के जीवन को, उसके सुख-दुख को, उसके संघर्ष को, उसकी मनोदशा को और कठिनाई भरे जीवन को। एक राजा को अपनी राजधानी और महल में यह सब जानने, अनुभव करने के लिए अन्य कोई जीवित शाला नहीं हो सकती। रामराज्य के सुशासन की कथा वनवास से प्रारम्भ होती है।
राम को यह वनवास काल प्रकृति की गोद में बिताने से प्रकृति के रहस्यों का गूढ़ अनुभव हुआ। पशु-पक्षी, विभिन्न प्रकार के वृक्ष, उनके फल-फूल -सभी उनको अपने सहायक जैसे लगे। इसके माध्यम से हमें समझाया गया है कि प्रकृति की गोद वास्तव में भगवान की गोद है। वहां बैठकर जीवन के गुण सीखे जा सकते हैं।
राम ने वनवास में ऋषि- मुनियों का सान्निध्य प्राप्त किया। उनके आश्रम देखे। उनसे सत्संग किया उनसे कथाएं सुनी। प्राचीन स्थलों का परिचय प्राप्त किया और राक्षस संस्कृति से उत्पन्न समस्याओं को निकट से जाना।

Tuesday, October 13, 2009

बच्चों के दोस्त बनिए



आजकल बच्चों के लिए खिलौनों का बाजार खूब सजा-धजा है। विभिन्न प्रकार के रंगों वाले खिलौने दुकानों पर प्रदर्शित किए जा रहे हैं, जो बच्चों को ललचा रहे हैं। इन खिलौनों में इलेक्ट्रॉनिक खिलौने भी हैं, जो पावर सेल से चलते हैं। इन खिलौनों की कीमत आसमान तक छूती है। हर डिजाइन के ऐसे-ऐसे खिलौने हैं कि हम हैरत में पड़ जाएं।

अब बच्चों के लिए खिलौने खरीदने निकले तो सस्ते महंगे का सवाल कैसा? बच्चे हमारे प्यारे हैं। आंख के तारे हैं। उनके लिए खिलौने खरीदते समय सस्ते खिलौने लेना गवारा नहीं। खिलौने भले ही बच्चों के लिए हों, किन्तु वे हमारे स्टेटस सिम्बल भी तो हैं। आजकल हमारे मित्र, रिश्तेदार आदि आते हैं, तो उन्हें बच्चों के साथ खिलौने भी दिखाए जाते हैं। कितने खिलौने हैं? किस मूल्य के हैं? कहां से खरीदे?- इन सवालों पर चर्चा होती है। बच्चे या तो मिलजुलकर उनसे खेलते हैं या आपस में लड़ते हैं। लेकिन खिलौने प्रदर्शन की वस्तु तो हो ही गए हैं।

खिलौने बच्चों का खेल हैं। उनकी दुनिया खिलौनों की दुनिया है। उनसे मनोरंजन ही नहीं होता, वे खिलौनों से एक रिश्ता भी कायम कर लेते हैं। वे खिलौनों के साथ आनन्द मनाते हैं। बच्चों के लिए खिलौनों का मूल्य कोई अर्थ नहीं रखता। वे तो खिलौनों से खेलते हैं। एक कल्पना जगत का निर्माण करते हैं।

आपने भी बच्चों को देखा होगा। वे तमाम तरह के खिलौने होने के बाद भी जूते-चप्पलों से खेला करते हैं। आपके भारी भरकम जूते वे अपने छोटे से पैर में डाल चलाते हैं। उसमें मगन होते हैं। छोटे बच्चे घर के बर्तनों से भी खेलते देखे जा सकते हैं। उन्हें झूठमूठ की चाय बनाते आप देख सकते हैं। वे आपको भी वह चाय पेश कर खुश होते हैं। बच्चे किसी भी चीज से खेल सकते हैं। हमारे लाए खिलौने तो एक बहाना हैं।

परिवार में जब भोजन बनता है तब बच्चे अक्सर रोटी का आटा मांगते हैं। जब उन्हें मिल जाता है तो वे उससे कुछ न कुछ बनाने में मगन हो जाते हैं। लेकिन बच्चों के लिए सबसे अच्छा खेल गुड़ियों का है। कपड़े के ये खिलौने उनका संसार बसा देते हैं। गुस्सा आ गया तो फेंक देंगे, वरना छाती से चिपटा कर सो भी सकते हैं। वे अपने इन खिलौनों से बातचीत भी करते हैं। लड़ते-झगड़ते और फिर दोस्ती भी कर लेते हैं।

जब हम छोटे थे तब कागज की नाव बनती थी। हवाई जहाज भी कागज के उड़ाए जाते थे। तमंचा भी कागज का बनता था। ये हवाई जहाज और नाव सृजन के बीज बोते थे, या कहें कि वह एक नया संसार बनाने की शुरुआत थी। असल में बच्चों के लिए सबसे अच्छे खिलौने वे हैं जिनमें सबसे कम पैसे की जरूरत होती है। हम जब घर में ही घर की चीजों से खिलौने बनाते हैं तो बच्चों को समय देते हैं। यह समय देना प्रेम है। इससे अपनत्व पैदा होता है। बच्चों को इससे गहरी खुशी मिलती है। सच तो यह है कि हमारे पास वक्त नहीं है, सिर्फ पैसा है। इसलिए बच्चों को बाजार से खिलौने दिला कर अपने कर्तव्य की पूर्ति समझ लेते हैं।

बच्चों के साथ खेलिए। यह सच्ची खुशी देने वाला है। उनके साथ खेलने की शर्त है कि आप खुद बच्चे बन जाएं। बुद्धि को एक तरफ रख दीजिए और देखिए कि बच्चे की खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा। आप दसियों तरीके से बच्चों के साथ खेल सकते हैं। किसी बड़े तामझाम की जरूरत नहीं, कोई भारी-भरकम खर्च नहीं। आप बच्चे के साथ चित्रकारी का आनंद भी ले सकते हैं। इसके लिए भी महंगे रंगों और कैनवास की जरूरत नहीं। फिर देखिए कला का कैसा संसार बसता है।

खेल और खिलौने बच्चों को शिक्षा देने का पहला सोपान हैं। कवि जायसी पदमावत में कहते हैं, ' धनि सो खेल खेल ही प्रेमा। ' अर्थात वह खेल धन्य है जो प्रेम से खेला जाए। यह बात बच्चों को सिखाने की जरूरत नहीं। वे सीखे हुए हैं। इसे हम वयस्कों ने सीखना है।

Sunday, October 11, 2009

आकाश को देखने का समय निकालिए


हम धरती को माँ की तरह पूजते हैं। उसके प्राकृतिक सौंदर्य को देख गदगद हो जाते हैं, पर हमारी दृष्टि आकाश की ओर कभी-कभी ही जाती है। आकाश भी हमारी प्रकृति का अंग है। यदि आप आकाश की ओर निहारें तो उसमें बनने वाले रंग-बिरंगे चित्रों को देखकर सब कुछ भूल जाएं।


पृथ्वी की तरह आकाश का भी अपना परिवार है। सूर्य है चमकता-दमकता, तो शांत है चंद्रमा। ग्रह हैं, नक्षत्र हैं, आकाश गंगा है, दिशाएं हैं, क्षितिज है, उल्का और पिंड हैं। आकाश देता है पुष्पों को हीरे के कणों की तरह ओस। आकाश की चुप्पी है तो उसमें बादलों की गड़गड़ाहट भी है। उससे उत्पन्न विद्युत की चकाचौंध भी।

छान्दोग्योपनिषद में कहा गया है, 'आकाश उत्कृष्ट है।'  सूर्य जब उदय होता है तो उसकी किरणें दूर-दूर तक लालिमा का अद्भुत सौंदर्य आकाश में बिखेर देती हैं। इसी के साथ पक्षियों का उड़ना, गोते लगाना, चहचहाना भी आरम्भ हो जाता है। कभी क्षितिज पर बादल हों तो उन्हें चीर कर सूर्य की किरणें आकाश के विशाल कैनवास पर रंग बिखेरती हैं। सूर्योदय एक दृश्य संदेश है कि उठो, जागो, कर्मरत हो, आगे बढ़ो। उसका यह सन्देश सभी पशु-पक्षी और मानव एक साथ सुनते हैं।

आकाश खेल का मैदान है : आकाश की भाषा मौन है। जो उसकी मौन भाषा समझता है, वह आकाश को निहार कर चिन्तन में डूब जाता है। आकाश कभी खाली नहीं रहता। उसमें हर समय चित्र बनते-बिगड़ते रहते हैं। आकाश में पक्षी उड़ते हैं। वे मुक्त हैं विचरण के लिए। आकाश पक्षियों के लिए एक खेल का मैदान है। उसमें वे अपने पदचिन्ह नहीं बनाते। आकाश में हवा है, पर पक्षी उड़ते हुए कोई लहर पैदा नहीं करते। आकाश में कोई बैरियर नहीं बना है।

पृथ्वी का हर प्राणी ऊपर और ऊपर उठना चाहता है। कल्पना में उड़ना चाहता है। आकाश के प्रति प्रबल आकर्षण है प्राणी मात्र में। इसीलिए आदमी गननचुम्बी इमारतें बनाता है। वृक्ष अपनी ऊँचाई को बढ़ाता हुआ आसमान को चूमने की कोशिश करता है। आदमी का मन उड़ता है आकाश में। जो हल्का हो वह आकाश में उड़ सकता है। जो अहंकार से भरा हो, वह आसमान नहीं छू सकता। आसमान छूने के लिए चाहिए पक्षी सा सरल, सहज और भोला स्वभाव।

आकाश है एक विशाल कैनवास : इसी पर उके री जाती है उषा की लालिमा, रजनी की कालिमा, चांद, तारों और नक्षत्रों की जगमगाहट। आकाश के विशाल कैनवास पर सुबह, दोपहर और संध्या को अलग-अलग रंग रहते हैं। रात में आकाश गंगा का दूधिया रंग आप उसी में देख सकते हैं। रात के अन्धकार का सन्नाटा आप आकाश में ही महसूस करते हैं। सितारों का टिमटिमाना वहीं होता है। आकाश मौसम के साथ अपने रंग बदलता है। बादलों से भरा आकाश कभी दैत्य सा विकराल दिखता है और कभी हाथी सा अलमस्त।

कालिदास ने मेघदूत में इसका वर्णन इस प्रकार किया है:

' उस (यक्ष) ने आषाढ़ मास के प्रथम दिन उस पर्वत की चोटी पर झुके हुए मेघ को देखा तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई हाथी मिट्टी का ढूह अपने मस्तक से गिराने का खेल खेल रहा है।'

आकाश में चाहे जितने चित्र बनें पर वे अपने आप बिगड़ते और मिटते भी रहते हैं। आसमान कभी गन्दा नहीं होता -काले बादल हों या उषा की लालिमा -आकाश हमेशा निर्मल और स्वच्छ बना रहता है।

आकाश देता है आशीर्वाद : आकाश केवल रिक्त जगह का नाम नहीं है। पृथ्वी की तरह आकाश भी प्रभु की लीला का प्रदेश है। हम ऐसी कल्पना करते हैं कि ईश्वर आकाश में बादलों के ऊपर कहीं रहता है। इसलिए जब भी ईश्वर से सम्बन्धित कोई बात होती है हम आसमान की ओर देख कर प्रभु इच्छा को धन्यवाद देते हैं। हम मानते हैं कि ईश्वर ने अपने आप को सर्वोत्तम रूप में आकाश में छिपा रखा है। हमारे अपने अन्दर भी है आकाश। अपने अन्दर स्थित आकाश को देखने का समय निकालिए, आपको आनन्द का सागर मिल जाएगा।

केदारनाथ मंदिर: वृषभ पिंड की पूजा

कहते हैं, किस्मत वालों को ही श्री केदारनाथ के दर्शन हो पाते हैं। जिस किसी ने भी बैल की पीठ के स्वरूप में विराजमान महादेव का दर्शन कर लिया, वह धन्य हो गया!

श्रीकेदारनाथका मंदिर 3593फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है। इतनी ऊंचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इसकी कल्पना आज भी नहीं की जा सकती है! यह मंदिर एक छह फीट ऊंचे चौकोरप्लेटफार्म पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हां ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की।

मंदिर की पूजा - श्री केदारनाथ को द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं।

पंचकेदार की कथा - ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के शाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे।

दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत:भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का हिस्सा पकड लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढसंकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का हिस्सा काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथका मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथमें, नाभि मदमदेश्वरमें और जटा कल्पेश्वरमें प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

यात्रा का संदेश - दृढसंकल्प, आत्मविश्वास और परिश्रम के अभाव में श्री केदारनाथ की दुर्गम पथरीलीराह पर चढाई संभव नहीं है। वास्तव में, यह यात्रा स्वर्गीय आनंद का स्त्रोत है। यहां न केवल मनोहर दृश्यावलियोंको सतत निहारने का आनंद मिलता है, बल्कि यह संदेश भी मिलता है कि संकट के रास्तों पर चले बिना सफलता के पुष्प नहीं खिल सकते हैं। भगवान शंकर भले ही भोलेनाथ हों, लेकिन उन्होंने भ्रातृहत्या के लिए पांडवों को सहज ही क्षमा नहीं कर दिया।

भक्तों की निर्मल भक्ति के आगे भले ही भगवान झुके हों, लेकिन उन्होंने बार-बार अंतध्र्यान हो कर, यह संदेश दे दिया कि वे व्यर्थ की हिंसा को पसंद नहीं करते।

पांडव भगवान शंकर से क्षमा प्राप्त कर बदरीधाम की ओर गए, जहां से स्वर्गारोहण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अत:हम कह सकते हैं कि हिमालय का क्षेत्र देवलोक के समान है, जहां से स्वर्गारोहण का मार्ग खुलता है। इसलिए श्री केदारनाथ की यात्रा तप और साधना के समान है, जो हमें ईश्वर की गरिमा-महिमा का दर्शन कराकर आनंद से भर देती है।

-सत्यनारायण भटनागर

Friday, October 9, 2009

नोनू भटका मेले में (कहानी)

कुछ महीनों पहले एक मेला देखने नोनू अपने माता- पिता के साथ गया। मेले जाने के पहले माँ ने उसे समझाया, 'देखो उँगली पकड़कर चलना। मेले में बहुत भीड़ होती है। यदि उँगली छोड़ी और भटक गए तो फिर परेशानी होगी और देखो यदि साथ छूट ही जाए तो रोना मत। तुम्हारे जेब में घर का पता, मोबाइल नंबर लिखकर रख दिया है। किसी भी पुलिसवाले भैया से कहोगे तो वह तुम्हारी मदद करेगा।'

नोनू को मजा आ गया। उसे तो मेले में जाने की जल्दी थी। मेले में भीड़ ही भीड़ थी। बड़े-बड़े लोगों में बच्चे तो बेचारे दिखते ही नहीं थे।

कोई बच्चा गोद में था तो कोई कंधे पर। नोनू माँ के पीछे ऐसे चल रहा था, जैसे रस्सी से बँधा हो। उसे कष्ट हो रहा था। यह भी कोई चलना है। यह भी कोई आनंद है। वह सोच ही रहा था कि खुला मैदान आ गया।

मैदान में दुकानें थीं। फुग्गेवाले थे। खिलौने की दुकानें थीं। उसने फुग्गे के लिए हठ की। पापा ने फुग्गा खरीद दिया। फिर सीटी खरीदी और चाट खाने के लिए बैठ गए।

इधर-उधर देखते,  उछलते-कूदते,  गुनगुनाते नोनूजी चल रहे थे कि भीड़ का रेला आया और जिसका डर था, वही हुआ।

उनकी माँ की उँगली छूट गई और उन्होंने भीड़ के बीच अपने को अकेला पाया। पहले तो नोनू रूआँसा हुआ,  मगर घबराया नहीं। माँ ने उसकी जेब में घर का पता और मोबाइल नंबर जो रखा था। वह मैदान में एकतरफ खड़ा सोच ही रहा था कि एक दीदी उसको उसकी ओर मुस्कुराते दिखी। वह भी मुस्कुराया। वह दीदी पास आई पूछा- 'क्या भटक गए हो?'

नोनू ने भोलेपन से कहा- 'मेरे माता-पिता खो गए हैं। उन्हें खोजना है। ' दीदी ने पूछा- 'तुम्हारे पास पता है?'  नोनू ने जेब से पता निकालकर बताया।

दीदी बोली- 'ठीक है,  हम तुम्हें घर तक पहुँचा देंगे।'

नोनू ने कहा- 'क्या आपके पास मोटर गाड़ी है? मेरा घर तो बहुत दूर है।' दीदी हँसी। बोली- 'मैं परी हूँ। मैं तुम्हें गाड़ी से भी जल्दी पहुँचा दूँगी।'

नोनू ने कहा- 'आप कैसी परी हैं? परी तो सफेद वस्त्र पहनती है। आप तो यूनिफॉर्म पहने हुए हो।'

परी ने कहा- 'हम मेले की परी हैं। खोए हुए बच्चों की परी। हम भी मेला घूमने-फिरने, मजा करने आई हैं। जो बच्चे दूसरों के साथ मित्रता और प्रेम से रहते हैं, हम उनसे दोस्ती करती हैं और उनकी मदद करती हैं।'

परी ने नोनू को ऑटो रिक्शा में बिठाया और नोनू अपने माता के पास आ गया। माँ ने पूछा- 'कहाँ भटक गए थे?  कौन लाया तुम्हें?'  नोनू ने कहा- 'हमें परी लाई है। बड़ी प्यारी सहेली है हमारी,  आप भी मिल लो।'

नोनू पलटा तो वहाँ न तो परी थी और न ऑटो रिक्शा। वे जा चुके थे। माँ ने कहा- 'देखो नोनू यदि मेले में भटक जाओ तो चाहे जिसके साथ चल देना ठीक नहीं। पुलिस या स्काउट की मदद ही लेना चाहिए। ऐसे अपरिचितों के साथ चल देने में खतरे भी हैं। इस तरह नहीं आना चाहिए था।'

नोनू के आगे उस परी का भोलाभाला चेहरा दिखाई दिया। उसके पंख नहीं थे और वह यूनिफॉर्म पहने थी और चल भी रही थी ऑटो रिक्शा में। फिर भी वह साफ दिल की परी थी।

उसने तो साफ कहा कि जो बच्चे दूसरे बच्चों से प्रेम करते हैं, वे उनसे दोस्ती करती है। वह मन ही मन मुस्कुराया। दूसरे बच्चों के साथ सच्ची मित्रता व सहयोग करने वाली दीदियाँ परियाँ ही तो होती हैं, भले ही वे स्वप्न में न आई हों। नोनू फिर से अपने खेलने में लग गया।

Tuesday, October 6, 2009

हड़कू के मन में क्या है? (कहानी)


उनकी छुटकी-सी बिटिया लगभग बेसुध पड़ी है। हड़कू और मंगलिया को ओझा ने उपाय सुझाया है, पर हड़कू क्यों मना कर रही है?


हल्दुआ ग्राम में जब सूरज की किरण पड़ती है तो दूर-दूर फैले झोपड़े दिखाई देने लगते हैं मानो वे खेत में उग आए हों। रात के अंधेरे में यहां कुछ भी दिखाई नहीं देता। पूरे गांव में जब कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनाई देती है, तो लगता है कुछ हलचल हुई है। अन्यथा पूरा गांव सोया-सा लगता है। झोपड़े दूर-दूर हैं, पर हैं एक-दूसरे से संबंधित। सब जानते हैं एक-दूसरे की आवाज़।

गांव सोया हुआ था। एक झोपड़े में आग तापते बैठे थे मंगलिया और उसकी पत्नी हड़कू। हड़कू और मंगलिया इसी गांव के निवासी हैं। यहीं पैदा हुए। यहीं की मिट्टी में खेले-कूदे और फिर कुछ ऐसा हुआ कि पति-पत्नी बन गए।

मंगलिया चिंतित था। उसकी दो माह की बेटी रोए जा रही थी। मां हड़कू परेशान थी। बेटी दूध ही नहीं पी रही थी। पता नहीं क्या हो गया? किसकी नज़र लगी? अभी कल तक तो खूब हलचल करती हाथ-पैर हिलाती, मुस्कराती थी। जब उसे भूख लगती, बस तभी रोती।

मंगलिया और हड़कू दोनों सड़क निर्माण कार्य में रोज़गार पाए हुए थे। दिन भर सड़क पर मिट्टी-पत्थर डालते, शाम ढले आ जाते झोपड़े पर। बेटी सोई रहती। कभी परेशान नहीं किया उसने। आज पता नहीं क्या हो गया। दोनों चिंतामग्न बैठे थे।

मंगलिया ने कहा ‘हड़कू, कल सुबह-सुबह चलते हैं शहर। वहां डॉक्टर को दिखाते हैं। हालत तो अच्छी नहीं है।’ हड़कू चिंता में पड़ी थी। बोली, ‘क्या होगा शहर ले जाने से? कितनी दूर है यहां से। फिर वहां बहुत खर्च है। वहां जाने पर रोज़गारी भी नहीं मिलेगी। भगवान ने चाहा, तो बेटी ठीक हो जाएगी। तुम ओझा को बुला लाओ। वही ठीक कर देगा।’

मंगलिया को लगा ठीक ही कहती है हड़कू। शहर है दूर-दूर तक फैला, न जान, न पहचान। शहर की जान-पहचान होती है पैसा। वहां सब दूर तो पैसा लगता है। जाना तो सचमुच मुश्किल है। उसे हड़कू की बात समझ में आ गई। दोनों आग तापते-तापते सो गए।

सुबह अभी आई नहीं थी। अंधकार बाहें फैलाए पड़ा था। मंगलिया उठा और चल दिया अंधकार को चीरता ओझा के झोपड़े की ओर। उसकी इस हलचल से गांव के कुत्ते भौंकने लगे। गांव जाग गया। सब देखने लगे क्या गड़बड़ है। मंगलिया पहुंच गया था ओझा विश्वासी के खेत पर। उसने खेत की मेड़ पर खड़े हो, दोनों हाथ मुंह पर रख विश्वासी को आवाज़ लगाई। विश्वासी आवाज़ पहचान गया। झोपड़े के बाहर आया और पूछा, ‘क्या बात है मंगलिया?’

मंगलिया ने वहीं से कहा-‘ओझा भाई! बेटी बीमार है जल्दी चलो।’ मंगलिया की आवाज़ गूंज गई गांव भर में। गांव जान गया इस समाचार को। लोग उठ कर चल दिए मंगलिया के झोपड़े की ओर। सूरज अब दिखाई देने लगा था। खेत रोशनी से भर रहे थे। पगडंडी पर लोग मंगलिया के घर जाते दिखाई दिए। मंगलिया की बेटी नहीं, गांव की बेटी बीमार हो गई थी। सबको चिंता हो गई। मंगलिया के झोपड़े के आसपास गांव एकत्र हो गया था।

ओझा आया। उसने बेटी को देखा। दो माह की बेटी निस्तेज पड़ी थी। सांस धीमी चल रही थी। कोई हलचल नहीं हुई। ओझा ने मंत्र पढ़ा। कुछ चावल फेंके पर कोई हलचल नहीं हुई। ओझा लगातार कुछ बुदबुदा रहा था। आसमान को ताक रहा था, मानो पुकार रहा हो किसी को।

थोड़ी देर यह सब कर वह बोला, ‘यह तो गड़बड़ मामला है कोई हवा लगी है। किसी की बुरी नज़र लग गई है। इसमें तो बहुत खर्चा होगा?’ मंगलिया ने पूछा- ‘बहुत याने कितना?’

ओझा बोला,‘कम से कम तीन हजार।’ उपस्थित लोगों में हलचल मच गई। बेचारा मंगलिया इतना कहां से लाएगा। इतना धन होता, तो शहर नहीं ले जाता। मंगलिया मौन रहा। मौन ही उसका उत्तर था। ओझा ने हलचल सुनी। वह समझ गया कि मांग कुछ ज्यादा हो गई।

बोला, ‘मामला ऐसा ही है फिर भी मंगलिया की हालत देखकर कुछ कम खर्चा करूंगा। गांव वाले मदद करें। गांव की बेटी का सवाल है।’ मंगलिया हाथ जोड़े बोला,‘ओझा भाई, सड़क की मजदूरी कर काम चला रहा हूं। अभी खेत भी खाली है आपको मैंने कष्ट दिया। आप क्षमा करना।’ ओझा ने सुना, समझ में आया कि उससे गलती हो गई।

वह समझ रहा था कि गांव वाले मिलजुलकर कुछ करेंगे। दया का समुद्र उमड़ेगा और उसकी आज की सुबह मंगलमय हो जाएगी। उसने मंगलिया को हाथ-जोड़कर क्षमा मांगते देखा, तो पैंतरा बदला। बोला, ‘यह सच है कि तुम इतना न कर पाओगे।

ऐसा करो कि बकरी का एक मेमना ही दे दो, तो मैं ऐसा करूंगा कि यह संकट टल जाए। इससे कम में तो कुछ हो ही नहीं सकता।’ मंगलिया के पास तो मेमना भी न था। उसने फिर हाथ जोड़कर कहा-‘ओझा भाई! मेरे पास तो मेमना भी नहीं है। मैं क्या करूं?’

उसकी आवाज़ में निराशा थी। वह बुझ-सा गया था। मां हड़कू बार-बार बेटी की ओर देख रही थी। बेटी निढाल पड़ी थी। सांस धीमे-धीमे चल रही थी। कोई हलचल नहीं थी। वह ओझा की बात सुन रही थी। पति मंगलिया की बेबसी देख रही थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे, तभी उसे उसके भाई बुधरिया का स्वर सुनाई दिया, ‘ओझा भाई! मेरे पास है मेमना, मैं दे दूंगा। आप बलि की जो क्रिया करना हो, करो। ’

यह स्वर जादू भरा था। गांव वालों में हर्ष छा गया। चलो, गांव की बेटी के लिए कुछ हुआ। अब शायद बच जाए बेटी। मंगलिया के चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह शांत था। तभी हड़कू बोली, ‘मैं अभी तैयार नहीं हूं। ओझा भाई, आप कल आना। मैं आज सोचूंगी।’ उसने स्नेहपूर्ण नज़रों से बुधरिया को देखा। ओझा को बुरा लगा। बना-बनाया खेल बिगड़ गया। बोला, ‘ठीक है जैसी इच्छा। हड़कू को जब अपनी बेटी की चिंता नहीं तो मैं क्या करूं?’

गांव वाले सब चर्चामग्न थे। क्या हो गया? क्यों मना कर दिया हड़कू ने? पता नहीं हड़कू के मन में क्या है। कल क्या होगा? क्या हड़कू तैयार होगी या मना कर देगी। पुरुषों का मत था कि हड़कू ने गलती कर दी। अपनी बेटी की जान बचाने के लिए एक क्या, ऐसी कई बलि दी जा सकती हैं। गांव की महिलाएं चुप थीं। वे समझ रही थीं हड़कू की पीड़ा। पर चुप थीं। कल पता चल ही जाएगा। अगले दिन सुबह ओझा स्नान ध्यान कर तिलक लगाए तैयारी से उपस्थित हुआ। बुधरिया मेमने को गोद में उठाए ले आया। ओझा ने कंकू -चावल मेमने पर मंत्र पढ़कर डाले और बोला, ‘मंगलिया और हड़कू अपने दोनों हाथ मेमने पर रखकर बोलो,  मेमना हमने बेटी की जान के खातिर ओझा को भेंट दिया।’

हड़कू बोली, ‘ओझा भाई! ऐसा नहीं होगा। जैसी मेरी बेटी, वैसी ही बकरी के लिए यह मेमना है। मैं मां हूं,  मैं जानती हूं संतान की मृत्यु का दुख क्या होता है। इस मेमने की बलि से बकरी को जो हृदय विदारक पीड़ा होगी, वह मैं जानती हूं। मैं अपनी बेटी के लिए मेमने की जान नहीं जाने दूंगी। मेरी बेटी जाए या रहे- यह भगवान की इच्छा है। मैं मेमने की बलि नहीं होने दूंगी। आप सब मुझे क्षमा करें।

सब सुनकर स्तब्ध रह गए। एक मां की वाणी में संतान का दर्द समाया हुआ था। हड़कू आंख बंद कर प्रार्थना में रत थी। मेमना उछल-कूदकर आनंद मना रहा था।

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