Wednesday, August 26, 2009

मृत्यु का सन्देश क्या है हमारे लिए

मृत्यु का एक डरावना, भयानक चित्र हमारे मन मन्दिर में पता नहीं कब से बैठा है । हम सब चर्चा कर लेते है किन्तु मृत्यु की चर्चा से डरते है । मृत्यु का नाम सुनते ही हमें लगता है कि अपशकुन हो रहा है । हम राम राम कर उठते है । मृत्यु हमें इसलिए डराती है कि हम नहीं जानते कि उसके बाद क्या होगा किन्तु मृत्यु ही एक ऐसा तथ्य है जो सुनिश्चित है । यह तय है कि जिसने जन्म लिया है वह मृत्यु को प्राप्त होगा, आज नहीं तो कल इस दुनिया को छोड़कर जाना है । सदा बने रहने की हमारी प्यास अभी तक तो पूरी नहीं हुई है । अमृत पीने वाले देवताओं का कहीं अता पता नहीं है ।

मृत्यु का आगमन - मृत्यु निश्चित है किन्तु उसका आगमन का पता नहीं है वह कभी भी, कही भी कैसे भी आ सकती है । हमने शिशुओं को, बच्चों को, जवानों को मृत्यु के पाश में बॅधते देखा है । उनकी मृत्यु की कल्पना ही नहीं थी, वे क्षण भर में दुनिया छोड़कर चले गए । जो बीमार नहीं थे, वे भी मृत्यु को प्राप्त होते देखे गए है जो बीमार है वे तो इस शंका में ही मृतवत रहते है । वृद्धावस्था में तो मृत्यु का इन्तजार रहता ही है । आज नहीं तो कल उन्हे जाना ही है । उनकी मृत्यु तो आना ही है ।

मृत्यु का आश्चर्य - मृत्यु की इस सुनिश्चितता के बाद भी यह सचमुच आश्चर्यजनक तथ्य है कि हम मृत्यु को भुलाकर नित वे सब कर्म करते है जो हमें करना ही नहीं चाहिए । महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर और यक्ष का एक रोचक संवाद है । यक्ष एक प्रश्न करता है कि इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? जवाब में धर्मराज युधिष्ठिर कहते है कि मृत्यु के नित्य आगमन के निश्चित तथ्य के बाद भी हम उसे भूला कर कार्य करते रहते है । यह विचार कर कि वह मरा है, हम नहीं मरेगे । हम सदा मृत्यु को भूलाए रखते है । यही सबसे बडा आश्चर्य है ।

सब रोगो की एक दवा - मृत्यु सब रोगों की एक दवा है । मृत्यु के बाद फिर कोई रोग नहीं होता । मृत्यु हमारी सारी समस्याएं एक क्षण में समाप्त कर देती है । सारे दुःख दर्द मिटा देती है । मृत्यु के बाद हमारी उपस्थिति का कोई चिन्ह शेष नहीं बचता । केवल हमारी स्मृतियाँ की शेष बचती हैं। इसलिए कहा जाता है कि आप डूबे, जग डूबा । हमारी मृत्यु के बाद इस संसार की उपस्थिति का क्या अर्थ रह जाता है । हमारे देखते देखते ही हमारे अपने सभी एक एक कर चल दिए और जगत की स्लेट कोरी की कोरी है । उनका कोई चिन्ह आज नहीं है । इसलिए इस संसार को असार भी कहा जाता है ।

क्या कहती है मृत्यु - मृत्यु धीमे से आती है और एक जोरदार झटके के साथ जीवन की डोर समाप्त कर चुपचाप चली जाती है। हम इसे देहावसान कहते है, यह देहावसान की घटना भी हमें कुछ कुछ कहती है । हम उसे सुनते भी है पर भूला देते है । श्मशान यात्रा के समय एक वैराग्य आता है जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि यह संसार क्षण भंगुर है । यह अनित्य है और हमे इसके मायामोह से दूर रहना चाहिए । यह वैराग्य हम पर क्षणिक रहता है । श्मशान वापसी के बाद हम पुनः अपने कर्मक्षे़त्र में व्यस्त हो जाते है ।

इस श्मशान वैराग्य का भी जीवन में एक अर्थ है यदि हम उसे स्मरण रख सके। यदि हम इस वैराग्य को स्मरण रख सके तो फिर हम काम, क्रोध, लाभ, लालच, पाखण्ड, हिंसा, व्यर्थ निंदा, धोखा, मोह, ममता, परनिन्दा आदि आसुरी वृतियों से अपने को बचा सकते हैं। जब जीवन इतना क्षणिक है तब इसे त्यागने के बाद इन आसुरी वृतियों की स्मृतियाँ छोड़ जाने का क्या अर्थ है। यदि यह वैराग्य बना रहे तो जीवन की दिशा ही बदल जाए । मृत्यु हमें आकर चुपचाप ही सही , यह शिक्षा तो देती ही है।

क्या संदेश है मृत्यु का - जीवन के साथ मृत्यु का संबध अटूट है। अतः मृत्यु हमें वैराग्य का ही संदेश नहीं देती, वह जीवन को कर्मवीर बनाकर आनंदपूर्वक जीवन यापन का भी संदेश देती है। मृत्यु जब कभी भी आ सकती है, कहीं भी आ सकती है तब हमें यह सोचना चाहिये कि इस धरती पर हम जिस कार्य के लिये उपस्थित हुए हैं उसे बिना किसी विलंब के तत्काल आलस्य रहित होकर आज और अभी निपटाएं। कल का पता नहीं है। यह सूरज कल हमारे लिए उदय हो या न हो। इसलिए मृत्यु कहती है कि कर्मवीर बनो। वर्तमान में जिओ। कल के लिए कल्पना मत करो। जो आज और अभी करना है उसे कल पर मत टालो। वर्तमान का आनंद लो। जीवन के जो क्षण उपलब्ध हैं उनका आनंद लो।

वर्तमान के इस आनंद लेने का यह भी अर्थ है कि अतीत को भूल जाओ। अतीत भूत है वह मर चुका है। भविष्य का पता नहीं है वह आए या न आए । इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवदगीता में देहावसान की बेला का स्मरण करा अर्जुन को वर्तमान युद्ध में कामना, ममता और स्वार्थ त्यागकर युद्ध करने को प्ररित किया। गीता मृत्यु का स्मरण करा कर कर्मवीर बनाने का संदेश है। गीता ही मृत्यु के बहाने अभय का पाठ याद कराते हुए वर्तमान में जीवन जीने का पाठ पढ़ाती है। मृत्यु का यह संदेश हमें हमारे देश के विभिन्न ग्रन्थों में स्पष्टता से दिखाई पडता है।

महाभारत का संदेश - महाभारत में युद्ध के भयानक चित्र हैं किन्तु उसमें शान्ति पर्व भी है। शान्ति पर्व में महर्षि व्यास कहते हैं, ‘जो कल्याण कार्य हैं उसे आज ही कर डालिए। आपका यह समय हाथ से न निकल जाए क्योंकि कार्यो के अधूरे होने पर भी मृत्यु आपको खींच ले जायेगी ’ इसी पर्व में आगे कहते हैं ‘कल किया जाने वाला कार्य आज पूरा कर लेना चाहिए जिसे सायंकाल करना है उसे प्रातःकाल ही कर लेना चाहिए क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि इसका काम अभी पूरा हुआ या नहीं।’

एक कथा - इसका स्पष्ट अर्थ है वर्तमान में जिओ। कर्मवीर बनो। ‘ बिती ताही बिसार दे आगे की सुध लेव ’ इस संबध में एक कथा प्रचलित है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर राजकाज में व्यस्त थे तभी एक ब्राम्हण याचक बन कर आया। धर्मराज ने कहा ‘ ब्राम्हण श्रेष्ठ इस समय तो मैं राजकाज में व्यस्त हूँ। आप कल आना मैं आपका यथोचित सम्मान करुंगा ’। ब्राम्हण चला गया । महावीर भीम भी यह देख सुन रहा था। उसने कर्मचारियों से कहा ‘ तूरही नगाड़े बजाओ। उत्सव की घोषणा करो ’ कर्मचारी घोषणा करने लगे। धर्मराज युधिष्ठिर ने यह ध्वनि सुनी तो राजमहल के बाहर आए। पूछा ,‘ क्या कारण है? ’ महावीर भीम ने कहा ‘ आपने मृत्यु को जीत लिया है। आप अमर हो गए। अतः उत्सव मनाने की घोषणा की गई है। ’ धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा ‘ ऐसी तो कोई बात नहीं है।’ तब भीम ने कहा ‘ अभी आपने ब्राम्हण से कहा कि वह कल पधारे। अर्थात कल तक के लिए तो आप अमर है। हमें तो एक क्षण का पता नहीं है। ’

तब धर्मराज युधिष्ठिर ने गलती स्वीकारी। ब्राम्हण को तत्कान बुलवाया और यथोचित सम्मान किया। यह है मृत्यु का स्पष्ट संदेश - आज, अभी, तत्काल। सदा जागरुकता से कार्यरत रहना। धन, सम्पदा, यश, मान - सम्मान, यौवन, गुण आदि के मोह से मुक्त रहना क्योंकि यह अनित्य है। ये सदा रहने वाले नहीं है। अतः इस दुनिया में रहने की विधि का मार्गदर्शन करती है मृत्यु।

जातक ग्रन्थ का संदेश - बौद्ध धर्म ग्रन्थ ‘ जातक ’ में भगवान बुद्ध के उपदेश संग्रहीत है। यह खुद निकाय ’ में समाविष्ठ ग्रन्थ है। इसमें कहा गया है ‘ आज ही प्रयत्न करणीय है ’ कौन जानता है कल मरना हो। उस महान सेना वाली मृत्यु से हमारा कोई समझौता नहीं है।’

इस संदेश से स्पष्ट है कि यह जगत अनित्य है। परिवर्तनशील है इसलिए हमें वर्तमान में जिना ही नहीं है, अपने कार्यो को पूरी लगन निष्ठा से सर्वोत्तम ढंग से पूर्ण भी करना है ताकि हमारे संसार छोड़ने के बाद हमें हमारे कार्यो के माध्यम से सही ढंग से जाना जाए। यदि मृत्यु के इस संदेश का हम चिन्तन करेंगे तो स्पष्ट होगा कि इस जीवन में आपसी विवाद, इर्ष्या, द्वेष पर निन्दा आदि आसुरी वृतियां व्यर्थ है । लाभ , लालच , हिंसा के लिए भी कोई स्थान हमारे जीवन में होना ही नहीं चाहिए। ईरान के फारसी कवि अब्दुल मजीद मजदूद बिन अदम कहते हैं ‘ यदि तुझे उठना है तो इसी समय उठ और जो कुछ करना है , कर ले अन्यथा जिस समय यमदूत तेरे सिर पर मृत्यु की तलवार ले उपस्थित होगा, उस समय शोक के अतिरिक्त कुछ हाथ न आएगा। इसी लिए कहा गया है –

‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होत है. बहुरी करेगा कब?

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मृत्यु का संदेश स्पष्ट है कि हमें आज अभी अपना कार्य सर्वोत्तम ढंग से पूर्ण लगन व निष्ठा से करना है। जीवन में आलस्य और टालमटल के लिए कोई स्थान नहीं है। मृत्यु अनजाने में हमें यह भी कहती है कि वृद्धावस्था भी मृत्यु तुल्य है। उसका इन्तजार भी मत कीजिए क्योंकि तब हम चाहते हुए भी कुछ न कर पाएगे। मृत्यु का संदेश हमें निराश नहीं करता, कर्मवीर बनाता है। मृत्यु सन्यास का संदेश नहीं है, प्रसन्नतापूर्वक, उत्साह और उमंग का जीवन जिने का संदेश है। हमें घबराकर अपशुगुन समझ मृत्यु को विस्मृत नहीं करना है। वरन सदा याद रखना है।

सत्यनारायण भटनागर

2 comments:

  1. मृत्यु का संदेश स्पष्ट है कि हमें आज अभी अपना कार्य सर्वोत्तम ढंग से पूर्ण लगन व निष्ठा से करना है। जीवन में आलस्य और टालमटल के लिए कोई स्थान नहीं है।
    जानकारी देने के लिए धन्‍यवाद !!

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  2. एक सार्थक चिन्तन भटनागर साहब। आपने ठीक कहा है कि कि इस नित्य परिवर्तनशील संसार में मृत्यु के बाद लोगों को उनके कार्यों के द्वारा याद किया जाता है - यही मृत्यु का संदेश भी है। कहते भी हैं कि - " कीर्तिः यस्य सः जीवति"। आचार्य रजनीश अपनी किताब "मैं मृत्यु सिखाता हूँ" में कहते हैं कि मृत्यु एक उत्सव के समान है। मौत तो एक दिन सबको आनी है लेकिन कब? किसी को पता नहीं। तो फिर -

    जो बीता कल क्या होगा कल
    है इस कारण तू व्यर्थ विकल
    आज अगर तू सफल बना ले
    आज सफल तो जनम सफल

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