Friday, October 30, 2009

जीत आपकी ही है



हमारा जीवन क्या है? इसकी अलग-अलग विद्वानों ने अपने ढंग से व्याख्या की है। कुछ कहते है यह एक कभी न खत्म होने वाली यात्रा है और दूसरे इसे बाजार बताते है जहाँ हमारे गुण अवगुणों का मूल्यांकन होता है। ऐसे भी विद्वान है जो जीवन को नाटक कहते है। उनका मत है कि हम सब संसार में एक विशेष प्रकार का अभिनय करने आते है जो अपने कार्यो से सर्वश्रेष्ठ अभिनय करता है, उसे याद किया जाता है। लेकिन इन सबसे अलग हट कर ऐसे भी विद्वान है जो इसे एक युद्ध कहते है। उनका मत है कि जीवन रूपी युद्ध में हम सब अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर विजेता बन सकते है। जीवन एक अवसर है जिसमें हम सफलता पाते है।

क्या जीवन एक युद्ध है - सच पूछो तो सफल जीवन एक युद्ध है। इसमें जीवन मरण दोनो है। शुभ है तो अशुभ भी है। यहाँ कर्म ही कर्म है। जीवन में सब गुण अवगुण समाहित हो जाते है। एक सैनिक की तरह जो जिया, उसका जीवन एक सफल जीवन माना जा सकता है। इसलिए साहित्यकार जयशंकर प्रसाद कहते है ’ जागरण का अर्थ है कर्म क्षेत्र में अवतीर्ण होना और कर्मक्षेत्र क्या है जीवन संग्राम ।’ साहित्यकार जैनेन्द्र का मत है ’जीवन कुरूक्षेत्र है। वह इसलिए युद्ध क्षेत्र है भी है। यह जीवन की विचित्रता और जटिलता है कि युद्ध को और धर्म को उसमें साथ साथ साधना पड़ता है। इस साधना में जीवन का रूप आप ही आप धर्म युद्ध हो जाता है।

क्यों है संग्राम - वास्तव में हमारा जीवन एक संग्राम है। इस संग्राम को धर्मयुद्ध बनाना ही एक कला है। भारतीय शास्त्रों में इसलिए इस संग्राम का गौरवगान मुक्त कण्ठ से किया गया है। इसलिए कहा जाता है कि संग्राम में मारे जाने पर स्वर्ग प्राप्त होता है और जीतने पर यश मिलता हैं । लोक में दोनो ही सम्मानीय है। इसलिए युद्ध सार्थक होते है। भगवत् गीता जैसा दार्शनिक ग्रन्थ यही कहता है । गीता का गान युद्ध क्षेत्र में ही हुआ और इसी में भगवान कृष्ण ने जीवन जीने की कला का ज्ञान कराया है। महात्मा गाँधी तो कहते है कि गीता माता है और जब भी कोई समस्या आती है वे इस माता के चरणों में अपना सर रख कर समाधान पूछते है। युद्ध के समय गाए गए गीत का यह अद्भूत महत्व है। पृथ्वीराज रासों में कवि चन्द बरदाई कहते है, ’ सभी सामन्त युद्ध में रस में लीन होने के कारण ब्रम्ह ज्ञानी से प्रतीत होते थे क्योकि उनके पास सुख दुःख की लौकिक भावना नहीं दिखाई पड़ती थी ।

गीता हमें जीवन में निष्काम कर्म करने का सन्देश देती है। संसार की आसक्ति ही हमारे दुःख और कष्ट का कारण है लेकिन क्या निष्काम कर्म योग संसार में व्यवहारिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है जहाॅ हम राग, द्वेष, घृणा लालच में दिन रात पड़े हुए है। इसलिए दार्शनिक सिद्धांत तक तो यह ठीक लगता है लेकिन जीवन संग्राम के व्यहारिक क्षेत्र में हम उसका कैसे प्रयोग करें? यह समझ में नहीं आता। यदि युद्ध क्षेत्र का सैनिक ब्रम्हज्ञानी है तो कैसे? यह समझ नहीं आता तो इसके लिए हम पुनः महात्मा गाँधी की वाणी सुनते है वे अहिंसा के प्रबल पक्षधर है। वे कहते है,   ’’एक सैनिक यह चिन्ता कब करता है कि उसके बाद उसके काम का क्या होगा? वह तो अपने वर्तमान कर्तव्य की ही चिन्ता करता है।’’ अतः यह स्पष्ट है कि एक सैनिक की तरह यदि हम अपने वर्तमान कर्तव्य कर्म को ही चिन्ता रहित होकर करते रहे तो हमारा कृत्य निष्काम कर्म होगा। होता यह है कि हम कर्म की प्रेरणा स्पष्ट रूप से अपने स्वार्थ, प्रलोभन और अहंकार के वश करते है। कर्म करते हुए हमारे मन में राग, द्वेष , घृणा, शत्रुता, लोभ, लालच के भाव हमें प्रेरित करते रहते है। मृत्यु की तो हम सोच ही नहीं सकते। यदि मृत्यु की आशंका मात्र हो तो हम भाग खड़े हो जब कि एक सैनिक जो युद्ध क्षेत्र में खड़ा है वह पहली शर्त के रूप में मृत्यु को स्वीकार करता है। मृत्यु से मित्रता के बिना तो कोई सैनिक हो ही नहीं सकता। हर सैनिक युद्ध शान्ति के लिए लड़ता है और अन्य कोई उसका उद्देश्य नहीं होता ।

जीवन का संग्राम युद्ध की तरह हमारे अन्तरतम की गहराई में सुलगता रहता है। जीवन की कला इसमें में है कि इस युद्ध को हम धर्म युद्ध की तरह लड़े।

युद्ध में कोई द्वितीय पुरूस्कार नहीं होता - हमारा जीवन एक युद्ध है। यहाँ हर व्यक्ति एक दूसरे से प्रतियोगिता करता है। अपने आपको सर्वश्रेष्ठ घोषित करता है। सबमें अपने अपने गुण है। यह जीवन संग्राम युद्ध की तरह ही है। लेकिन युद्ध में सैनिकों की एक संस्कृति होती है। नियम होते है कानून होता है उनका अनुशासन होता है। इस संस्कृति में, नियम एवं विधि का पालन करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य होता है। यदि इनका पालन न हो तो दण्ड दिया जाता है।

क्या है युद्ध की संस्कृति ? सेना में जो भी सैनिक युद्धरत होते है, उनका अपना कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता। वे देश के लिए लड़ते है। सबसे पहले देश सेवा उनका मतव्य होता है। उसके लिए प्राणों की बाजी वे लगा देते है। वे जानते युद्ध में हार जीत कुछ भी हो सकती है। वे मृत्यु के लिए तैयार होकर देश के लिए लड़ते है। अपन सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते है। इस युद्ध में या तो आप जितेंगे या आप खत्म हो जाएंगे। यहाँ द्वितीय पुरूस्कार नहीं होता।

ऐसे ही यदि जीवन संग्राम में हम अपने स्वार्थ को अलग रख कर सेवा भावना से सर्वश्रेष्ठ कार्य कर देश समाज के लिए अपने प्राणों की आहूति देने को तत्पर हो तो कहा जाएगा कि हम निष्काम कर्म योग को धारण कर लिए है। फल तो हमें जो मिलना होगा मिलेगा। सैनिक उसकी चिन्ता कहाँ करता है। आज हम स्वतंत्रता संग्राम के सैनिको की इसलिए चर्चा करते है, क्यो करते है उन्हे याद । इसलिए ना कि उन्होने अपने लिए कुछ न चाहा , देश की स्वतंत्रता के लिए वे प्राणों को त्यागने के लिए तत्पर हो गए। निस्वार्थ कर्म ही जीवन के संग्राम में सफलता की पहली और अन्तिम शर्त है।

विकल्प का सवाल ही नहीं - युद्ध में आपको अपना सर्वश्रेष्ठ कार्य प्रदर्शित करना है। जीतों या मरों । स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनोबा भावे ने इसलिए स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने के पूर्व अपनी समस्त उपाधियों को जला दिया ताकि संग्राम के बीच में उन्हे कभी कोई स्वार्थ प्रलोभित न कर सके। जीवन संग्राम में सफलता की वही शर्त है जो युद्ध में सफलता की है। स्वतंत्रता संग्राम भी एक जीवन संग्राम था।

महात्मा सुकरात ऐन्थेस नगर राज्य में विष का प्याला पी गए किन्तु सत्य की उद्घोषणा पर डटे रहे। वे चाहते तो समझौता कर सकते थे पर संग्राम में समझौते कहाँ होते है। फिर सत्य का संग्राम तो अनूठा होता है। महात्मा सुकरात इसलिए सत्य के संग्राम में विजय हो सके क्योकि उन्होने अपने जीवन में स्पाटी राज्य से हुए तीन युद्धों में सक्रिय भाग लिया था और वे महात्मा के साथ शूरवीर भी थे ।

जीवन संग्राम का अर्थ - जीवन संग्राम में हर व्यक्ति का एक लक्ष्य होता है। बिना लक्ष्य का भी कोई जीवन है। फ्रान्स की अध्यात्मिक सन्त श्री माॅ कहते है, जैसा तुम्हारा लक्ष्य होगा, वैसा तुम्हारा जीवन होगा। ’ इसलिए हमारा जो भी लक्ष्य हो, उसके लिए निरन्तर सर्वश्रेष्ठ कार्य करना और ’ करो या मरों ’ के भाव से लगे रहना जीवन के संग्राम में सफलता का सूत्र है। संग्राम में सर्वश्रेष्ठ वीरता भी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं होती । सामुहिक हित ही हमारा हित होता है। इसलिए इस भावना से जो कार्य किया जाएगा वह हर हालत में निष्काम होगा। फिर उसमें हार भी जीत है। जीत तो जीत है ही। हताश और कर्महीन अर्जुन को यही तो गीत सुनाया है भगवान कृष्ण ने।

अतः जीवन को संग्राम माने या नाटक सर्वश्रेष्ठ वीरता दिखाए या अभिनय भाव एक ही है, इसलिए जीवन का कोई लक्ष्य बनाइए । उँचा लक्ष्य चुनिए और संग्राम में करो या मरो के भाव से सम्मिलित हो जाइए जीत आपकी ही है।

1 comment:

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